बुधवार, 22 दिसंबर 2010

गहनता ही दुख का मूल कारण

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 बात बहुत अजीब है पर सच्ची है। रिश्ते की गहराई में दुख भी उतना ही गहरा होता है। जितना गहरा रिश्ता उतना ही गहरा दुख। दिखता नहीं है , दबा होता है कहीं ...किसी कोने में। जैसे- जैसे रिश्ता गहराता जाता है दुख भी प्रकट होने लगता है धीरे-धीरे। रिश्ता जब धीरे-धीरे अपनी पकड़ पाने लगता है तभी असल में उस रिश्ते से हमारा परिचय होने लगता है........,धुन्ध छंटने लगती है........सब खुलने लगता है तो जान पाते हैं कि जो था एक छलावा था , भ्रम था पर तब तक इंसान उस रिश्ते में कई पड़ाव जी चुका होता हैं। जब तक किसी रिश्ते से दुख नहीं जुड़ा वो रिश्ता है ही कहाँ...उसका अस्तित्व ही नहीं.......वो रिश्ता अभी पका ही नहीं .........बीज अभी फूटा ही नहीं ..............कोंपलें ही नही आई........खुशबू फैली ही नहीं तो रिश्ता है कहाँ कहीं नहीं। रिश्ता जब धीरे-धीरे परिपक्व होगा गहराएगा तभी तो अनुभूति होगी पहचान होगी उस रिश्ते से। साफ तस्वीर तो तभी नज़र आएगी। दिखेगा रिश्ता क्या कुछ समेटे था अपने अन्दर जो अभी तक गुम था अब सामने है.......।
                  रिश्ता जब बन्धता है तब इंसान एक तालाब की तरह होता है.....शांत है वो....अभी पूर्ण रूप से बन्धा नहीं है किसी से । उसने जाना ही नहीं कि रिश्ते का तानाबाना क्या है। वो बस शांत है........। पर जब रिश्ता बन्ध गया तो वो उस रिश्ते में जीने लगता है साथ-साथ । तब उसकी स्थिति लगभग एक नदी की तरह होती है। कहीं पर शांत कहीं पर हलचल । मन किया तो चल दिये एक दो कदम रिश्ते में बन्धते हुए न मन किया तो ठहरे रहे । धीरे-धीरे इंसान गति पकड़ लेता है रिश्ते में डूबता जाता है। फिर वो स्थिति आ जाती है रिश्ता गहनता की चरम सीमा पर होता है तो इंसान की स्थिति एक समुद्र सी हो जाती है.... । बाहर से हलचल अन्दर से शांत .........। शायद अजीब सी लगती है ये बात कि जब इंसान अन्दर आत्मिक रूप से शांत है तो बाहरी हलचल से क्या फर्क पड़ेगा ....पड़ेगा फर्क पड़ेगा । Our external feeling depends upon internal depth .बाहरी आवेश का जुड़ाव है कहीं अन्दर से । जो कुछ निकला बाहर वो कहीं न कहीं अन्दर दबा पड़ा है । अन्दर वो शांत रह कर सिवाए अपने को दुख नहीं तो क्या दे रहा है और बाहरी हलचल उस रिश्ते से मिले दुख का विरोधाभास नहीं तो क्या है .......................।
                                                                  सुमन मीत

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

‘कनुप्रिया’ समुद्र-स्वप्न.........धरमवीर भारती (4)

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समुद्र-स्वप्न
कनुप्रिया (अंश)

जिस की शेषशय्या पर
तुम्हारे साथ युगों-युगों तक क्रीड़ा की है

आज उस समुद्र को मैंने स्वप्न में देखा कनु!

लहरों के नीले अवगुण्ठन में
जहाँ सिन्दूरी गुलाब जैसा सूरज खिलता था
वहाँ सैकड़ों निष्फल सीपियाँ छटपटा रही है
          -

और तुम मौन हो
मैंने देखा कि अगणित विक्षुब्ध विक्रान्त लहरें
फेन का शिरस्राण पहने
सिवार का कवच धारण किये
निर्जीव मछलियों के धनुष लिये
युद्धमुद्रा में आतुर हैं
              -

और तुम कभी मध्यस्थ हो                           
 कभी तटस्थ                           
 कभी युधरत

और मैं ने देख कि अन्त में तुम
थक कर
इन सब से खिन्न
, उदासीन,
विस्मित और
कुछ-कुछ आहत
मेरे कन्धों से टिक कर बैठ गये हो
और तुम्हारी अनमनी भटकती उँगलियाँ
तट की गीली बालू पर
कभी कुछ
,
कभी कुछ लिख देती हैं         
किसी उपलब्धि को व्यक्त करने के अभिप्राय से नहीं;
मात्र उँगलियों को ठण्डे जल में डुबोने का         
क्षणिक सुख लेने के लिए!

आज उस समुद्र को मैंने स्वप्न में देखा कनु!

विष भरे फेन
, निर्जीव सूर्य, निष्फल सीपियाँ,
निर्जीव मछलियाँ ......
- लहरें नियन्त्रणहीन होती जा रही हैं
 

और तुम तट पर बाँह उठा-उठा कर कुछ कहे जा रहे हो 
पर तुम्हारी कोई नहीं सुनता, कोई नहीं सुनता!

अन्त में तुम हार कर
, लौट कर,
थक कर
मेरे वक्ष के गहराव में
अपना चौड़ा माथा रख कर
गहरी नींद में सो गये हो .....
और मेरे वक्ष का गहराव
समुद्र में बहता हुआ
, बड़ा-सा ताजा, क्वाँरा, मुलायम,
गुलाबी 
पटपत्र बन गया है         
जिस पर तुम छोटे-से छौने की भांति
लहरों के पालने में महाप्रलय के बाद सो रहे हो!         
नींद में तुम्हारे होठ धीरे-धीरे हिलते हैं         
"स्वधर्म! ........ आखिर मेरे लिए स्वधर्म क्या है?"
          और लहरें थपक दे कर तुम्हे सुलाती हैं         
"सो जाओ योगिराज .... सो जाओ ..... निद्रा
समाधि है!"         
नींद में तुम्हारे होठ धीरे-धीरे हिलते हैं         
"न्याय-अन्याय, सद्-असद्, विवेक-अविवेक -         
 कसौटी क्या है? आखिर कसौटी क्या है?"
          और लहरें थपकी दे कर तुम्हें सुला देती हैं         
"सो जाओ योगेश्वर ........ जागरण स्वप्न है,
                                छलना है, मिथ्या है!"

तुम्हारे माथे पर पसीना झलक आया है
और होंठ काँप रहे हैं
और तुम चौंक कर जाग जाते हो
और तुम्हें कोई भी कसौटी नहीं मिलती
और जुए के पाँसे की तरह तुम निर्णय को फेंक देते हो

जो मेरे पैताने है वह स्वधर्म
जो मेरे सिरहाने है वह अधर्म ........         
और यह सुनते ही लहरें         
घायल साँपों-सी लहर लेने लगती है         
 और प्रलय फिर शुरू हो जाता है

और तुम फिर उदास हो कर किनारे बैठ जाते हो
और विषादपूर्ण दृष्टि से शून्य में देखते हुए
कहते हो - "यदि कहीं उस दिन मेरे पैताने
दुर्योधन होता तो ..................... आह
इस विराट् समुद्र के किनारे ओ अर्जुन
,
मैं भी
अबोध बालक हूँ!
         

 आज मैंने समुद्र को स्वप्न में देखा कनु!

तट पर जल-देवदारुओं में
बार-बार कण्ठ खोलती हुई हवा
के गूँगे झकोरे
,

बालू पर अपने पगचिन्ह बनाने के करुण प्रयास में
बैसाखियों पर चलता हुआ इतिहास
,
...... लहरों में तुम्हारे श्लोकों से अभिमन्त्रित गाण्डीव
गले हुए सिवार-सा उतरा आया है ......
           
और अब तुम तटस्थ हो और उदास

समुद्र के किनारे
नारियल का कुंज है
और तुम एक बूढ़े पीपल के नीचे चुपचाप बैठे हो
         

 मौन, परिशमित, विरक्त         
और पहली बार जैसे तुम्हारी अक्षय तरुणाई पर         
थकान छा रही है!

और चारों ओर
एक खिन्न दृष्टि से देख कर
एक गहरी साँस लेकर
तुम ने असफल इतिहास को
जीर्णवसन की भाँति त्याग दिया है
         

और इस क्षण         
 केवल अपने में डूबे हुए         
दर्द में पके हुए         
तुम्हें बहुत दिन बाद मेरी याद आयी है!

काँपती हुई दीप लौ जैसे
पीपल के पत्ते
एक-एक कर बुझ गये
         


उतरता हुआ अँधियारा ......

समुद्र की लहरें अब तुम्हारी फैली हुई साँवरी शिथिल बाँहें हैं
भटकती सीपियाँ तुम्हारे काँपते अधर

और अब इस क्षण तुम
केवल एक भरी हुई
पकी हुई
गहरी पुकार हो ..........
         

सब त्याग कर         
 मेरे लिए भटकती हुई ......
         
- धर्मवीर भारती

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

‘कनुप्रिया’ मंजरी-परिणय.........धरमवीर भारती (3)

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मंजरी-परिणय


आम्र-बौर का गीत


यह जो मैं कभी-कभी चरम साक्षात्कार के क्षणों में
बिलकुल जड़ और निस्पन्द हो जाती हूँ
इस का मर्म तुम समझते क्यों नहीं साँवरे !


तुम्हारी जन्म-जन्मान्तर की रहस्यमयी लीला की
एकान्त-संगिनी मैं


इन क्षणों में अकस्मात्
तुम से पृथक् नहीं हो जाती मेरे प्राण,
तुम यह क्यों नहीं समझ पाते कि लाज
सिर्फ जिस्म की नहीं होती
मन की भी होती है
एक मधुर भय
एक अनजाना संशय,
एक आग्रह भरा गोपन,
एक निर्व्याख्या वेदना; उदासी,
जो मुझे बार-बार चरम सुख के क्षणों में भी
अभिभूत कर लेती है।


भय, संशय, गोपन, उदासी
ये सभी ढीठ, चंचल, सरचढ़ी सहेलियों की तरह
मुझे घेर लेती हैं
और मैं कितना चाह कर भी तुम्हारे पास ठीक उसी समय
नहीं पहुँच पाती जब आम्र मंजरियों के नीचे


अपनी बाँसुरी में मेरा नाम भर कर तुम बुलाते हो !
उस दिन तुम उस बौर लदे आम की
झुकी डालियों से टिके कितनी देर मुझे वंशी से टेरते रहे
ढलते सूरज की उदास काँपती किरणें
तुम्हारे माथे के मोरपंखों
से बेबस विदा माँगने लगीं-
मैं नहीं आयी


गायें कुछ क्षण तुम्हें अपनी भोली आँखों से
मुँह उठाये देखती रहीं और फिर
धीरे-धीरे नन्दगाँव की पगडण्डी पर
बिना तुम्हारे अपने-आप मुड़ गयीं-
मैं नहीं आयी


यमुना के घाट पर
मछुओं ने अपनी नावें बाँध दीं
और कन्धों पर पतवारें रख चले गये-
मैं नहीं आयी


तुम ने वंशी होठों से हटा ली थी
और उदास, मौन, तुम आम्र-वृक्ष की जड़ों से टिक कर
बैठ गये थे


और बैठे रहे, बैठे रहे, बैठे रहे
मैं नहीं आयी, नहीं आयी, नहीं आयी
तुम अन्त में उठे
एक झुकी डाल पर खिला एक बौर तुम ने तोड़ा
और धीरे-धीरे चल दिये
अनमने तुम्हारे पाँव पगडण्डी पर चल रहे थे
पर जानते हो तुम्हारे अनजान में ही तुम्हारी उँगलियाँ
क्या कर रही थीं !


वे उस आम्र मंजरी को चूर-चूर कर
श्यामल बनघासों में बिछी उस माँग-सी उजली पगडण्डी पर
बिखेर रही थीं....


यह तुम ने क्या किया प्रिय !
क्या अपने अनजाने में ही
उस आम के बौर से मेरी क्वाँरी उजली पवित्र माँग
भर रहे थे साँवरे ?
पर मुझे देखो कि मैं उस समय भी तो माथा नीचा कर
इस अलौकिक सुहाग से प्रदीप्त हो कर
माथे पर पल्ला डाल कर
झुक कर तुम्हारी चरणधूलि ले कर
तुम्हें प्रणाम करने-
नहीं आयी, नहीं आयी,नहीं आयी !


पर मेरे प्राण
यह क्यों भूल जाते हो कि मैं वही
बावली लड़की हूँ न जो-कदम्ब के नीचे बैठ कर
जब तुम पोई की जंगली लतरों के पके फलों को
तोड़ कर, मसल कर, उन की लाली से मेरे पाँवों को
महावर रचने के लिए अपनी गोद में रखते हो
तो मैं लाज से धनुष की तरह दोहरी हो जाती हूँ
और अपने पाँव पूरे बल से समेट कर खींच लेती हूँ
अपनी दोनों बाँहों में अपने घुटने कस
मुँह फेर कर निश्चल बैठ जाती हूँ
पर शाम को जब घर आती हूँ तो
निभृत एकान्त में दीपक के मन्द आलोक में
अपने उन्हीं चरणों को
अपलक निहारती हूँ
बावली सी उन्हें बार-बार प्यार करती हूँ
जल्दी-जल्दी में अधबनी उन महावर की रेखाओं को
चारों ओर देख कर धीमे-से
चूम लेती हूँ।


रात गहरा आयी है
और तुम चले गये हो
और मैं कितनी देर तक बाँह से
उसी आम्र डाली को घेरे चुपचाप रोती रही हूँ
जिस पर टिक कर तुम मेरी प्रतीक्षा करते हो


और मैं लौट रही हूँ,
हताश, और निष्फल
और ये आम के बौर के कण-कण
मेरे पाँवों में बुरी तरह साल रहे हैं।
पर तुम्हें यह कौन बतायेगा साँवरे
कि देर ही में सही
पर मैं तुम्हारे पुकारने पर आ तो गयी
और माँग-सी उजली पगडण्डी पर बिखरे
ये मंजरी-कण भी अगर मेरे चरणों में गड़ते हैं तो
इसी लिए न कि कितना लम्बा रास्ता
कितनी जल्दी-जल्दी पार कर मुझे आना पड़ा है
और काँटों और काँकरियों से
मेरे पाँव किस बुरी तरह घायल हो गये हैं !


यह कैसे बताऊँ तुम्हें
कि चरम साक्षात्कार के ये अनूठे क्षण भी
जो कभी-कभी मेरे हाथ से छूट जाते हैं
तुम्हारी मर्म-पुकार जो कभी-कभी मैं नहीं सुन पाती
तुम्हारी भेंट का अर्थ जो नहीं समझ पाती
तो मेरे साँवरे-
लाज मन की भी होती है


एक अज्ञात भय,
अपरिचित संशय,
आग्रह भरा गोपन,
और सुख के क्षण
में भी घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी-


फिर भी उसे चीर कर
देर में ही आऊँगी प्राण,
तो क्या तुम मुझे अपनी लम्बी,
चन्दन-बाँहों में भर कर बेसुध नहीं
कर दोगे ?

रविवार, 14 नवंबर 2010

‘कनुप्रिया’ .........धरमवीर भारती (2)

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तीसरा गीत


घाट से लौटते हुए
तीसरे पहर की अलसायी बेला में
मैं ने अक्सर तुम्हें कदम्ब के नीचे
चुपचाप ध्यानमग्न खड़े पाया
मैं न कोई अज्ञात वनदेवता समझ
कितनी बार तुम्हें प्रणाम कर सिर झुकाया
पर तुम खड़े रहे अडिग, निर्लिप्त, वीतराग, निश्चल!
तुम ने कभी उसे स्वीकारा ही नहीं !


दिन पर दिन बीतते गये
और मैं ने तुम्हें प्रणाम करना भी छोड़ दिया
पर मुझे क्या मालूम था कि वह अस्वीकृति ही
अटूट बन्धन बन कर
मेरी प्रणाम-बद्ध अंजलियों में, कलाइयों में इस तरह
लिपट जायेगी कि कभी खुल ही नहीं पायेगी।


और मुझे क्या मालूम था कि
तुम केवल निश्चल खड़े नहीं रहे
तुम्हें वह प्रणाम की मुद्रा और हाथों की गति
इस तरह भा गयी कि
तुम मेरे एक-एक अंग की एक-एक गति को
पूरी तरह बाँध लोगे


इस सम्पूर्ण के लोभी तुम
भला उस प्रणाम मात्र को क्यों स्वीकारते ?
और मुझ पगली को देखो कि मैं
तुम्हें समझती थी कि तुम कितने वीतराग हो
कितने निर्लिप्त !


चौथा गीत


यह जो दोपहर के सन्नाटे में
यमुना के इस निर्जन घाट पर अपने सारे वस्त्र
किनारे रख
मैं घण्टों जल में निहारती हूँ


क्या तुम समझते हो कि मैं
इस भाँति अपने को देखती हूँ ?


नहीं, मेरे साँवरे !
यमुना के नीले जल में
मेरा यह वेतसलता-सा काँपता तन-बिम्ब, और उस के चारों
ओर साँवली गहराई का अथाह प्रसार जानते हो
कैसा लगता है-


मानो यह यमुना की साँवली गहराई नहीं है
यह तुम हो जो सारे आवरण दूर कर
मुझे चारों ओर से कण-कण, रोम-रोम
अपने श्यामल प्रगाढ़ अथाह आलिंगन में पोर-पोर
कसे हुए हो !


यह क्या तुम समझते हो
घण्टों-जल में-मैं अपने को निहारती हूँ
नहीं, मेरे साँवरे !


क्रमश :

सोमवार, 8 नवंबर 2010

‘कनुप्रिया’ .........धरमवीर भारती (1)

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‘कनुप्रिया’ .........धरमवीर भारती जी की अमिट कृति जो हमेशा के लिये उन्हें अमर कर गई। कृष्ण के प्रति राधा के आलौकिक प्रेम के हर पहलू को,राधा के मन में पनपते उन्मुक्त भावों को भारती जी बखूबी उकेरा है। बहुत समय से ये अभिलाषा थी कि उनकी इस कृति के कुछ अंश आप सबकी नज़र करूं ।आशा करती हूँ कि आपको मेरा ये प्रयास पसन्द आयेगा.........

पहला गीत

ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे
तुम को क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए-धूल में मिली हूँ
धरती में गहरे उतर जड़ों के सहारे
तु्म्हारे कठोर तने के रेशों में कलियाँ बन, कोंपल बन,सौरभ बन,लाली बन-
चुपके से सो गयी हूँ
कि कब मधुमास आये और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन से छा जाओ !

फिर भी तुम्हें याद नहीं आया, नहीं आया,
तब तुम को मेरे इन जावक-रचित पाँवों ने
केवल यह स्मरण करा दिया कि मैं तुम्हीं में हूँ
तुम्हारे ही रेशे-रेशे में सोयी हुई-
और अब समय आ गया कि
मैं तुम्हारी नस-नस में पंख पसार कर उडूँगी
और तुम्हारी डाल-डाल में गुच्छे-गुच्छे लाल-लाल
कलियाँ बन खिलूँगी !
ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरी ही प्रतीक्षा में
कितने ही जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे !


दूसरा गीत

यह जो अकस्मात्
आज मेरे जिस्म के सितार के
एक-एक तार में तुम झंकार उठे हो-
सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
तुम कब से मुझ में छिपे सो रहे थे।

सुनो, मैं अक्सर अपने सारे शरीर को-
पोर-पोर को अवगुण्ठन में ढँक कर तुम्हारे सामने गयी
मुझे तुम से कितनी लाज आती थी,
मैं ने अक्सर अपनी हथेलियों में
अपना लाज से आरक्त मुँह छिपा लिया है
मुझे तुम से कितनी लाज आती थी
मैं अक्सर तुम से केवल तम के प्रगाढ़ परदे में मिली
जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता था
मुझे तुम से कितनी लाज आती थी,

पर हाय मुझे क्या मालूम था
कि इस वेला जब अपने को
अपने से छिपाने के लिए मेरे पास
कोई आवरण नहीं रहा
तुम मेरे जिस्म के एक-एक तार से
झकार उठोगे
सुनो ! सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
इस क्षण की प्रतीक्षा में तुम
कब से मुझ में छिपे सो रहे थे।

क्रमश:

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा......जगजीत&चित्रा

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सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं ...............................................................


देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे -2
मेरी ख़ता मेरी वफा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं .............................................................


जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर -2
भेजा वही कागज उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं ..............................................................


इक शाम की दहलीज पर बैठे रहे वो देर तक -2
आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं ...............................................................


                                                                                              बशीर बद्र

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

मन के विचार

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कहते हैं जीवन में एक ध्येय लेकर चलना चाहिये एक लक्ष्य लेकर.................ताकि जीवन में कुछ मुकाम हासिल कर सको , कुछ हो आखिर में जो तुम्हारे जीवन की पूंजी होगी जीवन के अंतिम पड़ाव में तुम्हें लगे कि जीवन में जो सोचा वो कर लिया । पर क्या इंसान इस सोच के साथ ज्यादा समय टिक पाता है.........क्या आखिर में वो तृष्णा रहित हो जाता है , क्या उसका चंचल मन ठहर जाता है........वो शून्य मे लीन हो पाता है , शायद नहीं इंसान की इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं होती................। एक कड़ी है बस जो हर इच्छा को........हर अभीप्सा को.....हर चाह को एक दूसरे से जोड़े है एक की पूर्ति दूसरे के होने का सबब बन जाती है बस और कुछ नही होता । भावों का ताना बाना बुनता मन जकड़ लेता है अपने जाल में और हम बस देखते रहते हैं उसके बुने मायाजाल को जो नशवर है.................क्षणिक है....................एक तीव्र हवा का झोंका उसे नष्ट कर देगा , उसका अस्तित्व मिटा देगा । तो क्या वो ध्येय...........वो लक्ष्य......... भी उसके मन की ही उपज नहीं ,एक दबी सी चाह नहीं जो सारी उम्र इंसान का पीछा नही छोड़ती..........हर क्षण उसे जकड़े रहती है अपने बाहुपाश में......................
                                                                                     
                                                                                      सुमन ‘मीत’

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे............(शाहिद मीर & जगजीत सिंह)

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ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा..........................................


तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैनें
आ किसी दिन मेरे अहसास को तयकर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा..........................................

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा.........................................


                                                                               शाहिद मीर





शनिवार, 11 सितंबर 2010

जीवन के पल

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हर गुजरा पल
              इक याद छोड़ जाता है ,
उस याद के भरोसे
              इक आस छोड़ जाता है ,
आस के बहकावे में
              इक सांस छोड़ जाता है ,
सांस की परछाई में
              इक घुटन छोड़ जाता है ,
घुटन में जकड़ कर
              इक जीवन छोड़ जाता है ,
जीवन को जीने के लिये
              इक इंसान छोड़ जाता है !!


                                                                         सुमन ‘मीत’

बुधवार, 18 अगस्त 2010

"दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई " – गुलज़ार & जगजीत सिंह

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गुलज़ार जी एक बेमिसाल लेखक हैं और जब जगजीत सिंह जी उनके लफ्जों को सुर देते हैं तो वो एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं .................


उनकी एलबम मरासिम से एक गज़ल..............


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई.........


आईना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई...........


पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई.............


देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ..............


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई.........





रविवार, 8 अगस्त 2010

टिप्पणी देना भी एक कला है ।

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टिप्पणी देना भी एक कला है ।जिस तरह अपने विचारों , अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोकर हम लिखते हैं वो हमारी अपनी अनुभूती होती है अपने विचारों के प्रति .............वो विचार जो धीरे धीरे मानसपटल पर विचरते हुए लेखनी से कोरे कागज में रंग भर देते हैं ।उसी तरह हमारे भावों का प्रतिरूप हमें टिप्पणियों के रूप में मिलता है जो हमारे लेखन को सार्थक बना देता है ,हमारे लेखन की रंगत को और बढ़ा देते हैं । सच में ये महसूस करने की बात है कि कुछ ब्लॉगर बहुत अच्छी टिप्पणी करते हैं अच्छी से मेरा मतलब प्रशंसा करने वाली टिप्पणियों से नहीं है बल्कि सकारात्मक दिशा में ले जाने वाली से है। कभी कभी पोस्ट पर टिप्पणियों का प्रभाव हावी लगता है।मुझे खुद महसूस हुआ है कि टिप्पणी से मिले सुझाव आपके लेखन को नया आयाम देते हैं क्योंकि कभी कभी ऐसा होता है कि हम अपना 100% नहीं दे पाते चूक हो जाती है । कभी समय का अभाव ,कभी शब्दों की अभाव और हम अपने लेखन का विश्लेषण नहीं कर पाते ,तब ब्लॉगर मित्रों द्वारा दिये गये सुझाव आत्मविश्लेषण करवाते हैं कहां क्या चूक हो गई इसका आभास होता है और सृजनशीलता को नया आयाम मिलता है।मैने शुक्रगुजार हूँ आप सभी की जिन्होनें मेरे लेखन को सराहा और उचित सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन किया.............!!





सुमन ‘मीत’

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

कितना अवसरवादी हो गया है इंसान.................

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 आज इंसान कितना अवसरवादी हो गया है ।हर कोई बस दूसरे को नीचा दिखाने की फिराक में है । आज के इस अन्धे युग में इंसान अपनी इंसानियत तक भूल गया है हर कोई बस अन्धी दौड़ में भागे जा रहा है बिना ये जाने कि वो राह उसकी मंजिल तक जाती भी है या नहीं । उसे ये सोचने की फुर्सत ही कहाँ है वो तो बस ये देखता है कि दूसरा आगे जा रहा है और मैं उसे पीछे कैसे धकेल सकता हूँ ।बस यही सोच रह गई है इंसान की .............।अपनी इस सोच से वो अपनी मंजिल की राह भी भटक जाता है क्योंकि अपनी मंजिल की राह में तो उसने कदम बढ़ाया ही नहीं होता वो तो बस दूसरों की राहों मे नजरें लगाए रहता है कि कब दूसरा आदमी कदम बढ़ाए और मैं उसकी राह में रोड़े डाल दूँ.......।मन बहुत खिन्न होता है जब भी ऐसे लोगों को देखती हूँ ........।हमारे सभ्य समाज की सोच कितनी बदल गई है शिक्षा तो इंसान के जीवन में नई क्रांति लाती है उसके सोच के दायरे को बढ़ाती है ना कि उसे इतना संकीर्ण बना देती है कि उसे बोध ही नही होता कि कांटे बो कर कभी भी फूल नहीं खिला करते................ ।



मुझे याद है हिन्दी की कहावतें

*लालच बुरी बला है ।
*ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनका भला करते हैं जो अपना भला आप करते है।

परंतु अवसरवादी इंसान के लिये कहावतें कुछ इस तरह होनी चाहिये

*अवसरवादी होना भी एक कला है ।
*बैमानी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनकी सहायता करते हैं जो दूसरों का बुरा हाल करते हैं ।
                                                                                         
                                                                                            सुमन ‘मीत’








रविवार, 25 जुलाई 2010

‘महाकाल’ .......... जहाँ जलती थी रोज एक चिता

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अभी हाल ही में एक पारिवारिक यात्रा करके आई हूँ और आप सब से उसका अनुभव साझा करना चाहती हूँ ।

मंडी से करीब 80 कि.मी. की दूरी पर एक जगह है बैजनाथ जो शिमला  पठानकोट मार्ग के बीच में आती है ।वहां से करीब 3 कि.मी. लढ़भड़ोल मार्ग पर जाने पर एक धार्मिक स्थल है ‘ महाकाल’ ।काफी बड़े परिसर में फैले इस स्थल में 3 मन्दिर हैं जिसमें एक स्वयंभू शिवलिंग का प्राचीन मन्दिर है और एक दुर्गा माता का ।तीसरा मन्दिर शनि देव का है जिसके 12 स्तम्भ हैं जिन पर 12 राशियां अंकित हैं ।काले ग्रेनाइट से बने इस मन्दिर की छटा देखते ही बनती है । हमने देखा कि उन स्तम्भों पर लाल डोरी (मौली) बान्धी गई है तो मन में उससे सम्बन्धित बातें जानने की इच्छा हुई । पुजारी के अनुसार अपनी राशि वाले स्तम्भ पर डोरी बान्धने से अनिष्ट ग्रहों की शांति होती है ।वहां अभिलेख पर लिखे शब्दों के अनुसार प्राचीन में जालन्धर नामक समुद्र पुत्र दैत्य भगवान शिव का अनन्य भक्त था जिसने कठिन तप से शिव से मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था परंतु काल पर विजय प्राप्त करके अंहकार वश उसने ऋषि मुनियों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया तब देव अनुरोध पर भगवान शिव ने महाकाल रूप धारण कर उस दैत्य का वध किया था।तब से यह महाकाल के नाम से प्रसिद्ध है।कहा जाता है कि पहले यहाँ हर रोज एक चिता जरूर जलती थी जिसमें रोज कोई चिता न हो तो वहां घास का (पुला) गठ्ठा जलाया जाता था।
                भगवान शिव के बहुरूप के दर्शन कर आत्मिक शांति का अनुभव होता है एक ओर जहाँ ये भोले बाबा है जो भक्ति से जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर रूद्र देव भी जो दुर्जनों का नाश करने के लिये काल देवता ‘महाकाल’ बन जाते हैं ..............


मंदिर का परिसर


मेरे भांजे और भांजी
शनि देव की मूर्ति

स्तम्भ पर राशि
मंदिर के दर्शन
स्वयभू शिवलिंग
दुर्गा माता
प्राचीन शिव मंदिर
सोचा अपने ग्रहों की शांति भी कर ले (मेरी मम्मी )
शनि देव की शिला जहाँ तेल ,तिल,माह चढ़ाये जाते हैं
 
धूप बहुत थी छाया कम
मेरी बड़ी दीदी और बच्चे

एक दूसरे की ओर मुह किये भगवान् शिव और दुर्गा के प्राचीन मंदिर
आज भी एक चिता जला रही थी

शनि देव की छत्रछाया में हमारा परिवार

मंदिर में बना जल कुंड
प्रकृति के नज़ारे

बच्चों की मस्ती

मेरे पापा ,बच्चे ओर ड्रावर

रोज की भागदौड़ भरी जिन्दगी से कुछ राहत
मेरी मम्मी ,छोटी दीदी .बच्चे (एक मित्र )
मस्ती का आलम
घर की तरफ वापसी .............................




रविवार, 11 जुलाई 2010

नई चेतना

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मेरी पहली कोशिश कहानी लेखन में

धीरे धीरे पुल की ओर बढ़ते गौरी के कदम उसके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों को सामने ला रहे थे ।आकाश में बादल बस बरसने ही वाले थे और लगता मानो ये मेघ इस प्यासी धरती पर न्यौछावर होने को आतुर हैं पर..... गौरी वो तो बस चलती ही जा रही थी ।आज उसने पक्का निश्चय कर लिया था कि रोज की इस घुटन भरी जिन्दगी से मुक्ति पा लेगी खत्म कर देगी ये जिन्दगी से जद्दोजहद और बस सब शांत हो जायेगा हमेशा के लिये।
                                                                  कुछ रोज हुए उसकी इकलौती सहारा उसकी माँ भी उसे तन्हा छोड़ कर दूसरी दुनिया में चली गई थी ,अब गौरी के जीवन में सिवा तन्हाई के कुछ भी न था पहाड़ सी लम्बी जिन्दगी वो किसके सहारे जीती ।वो एक छोटी सी फैक्टरी में काम करती थी कालेज के बाद अच्छे अंक होने के बावजूद पैसे के अभाव से वो आगे नहीं पढ़ सकी ।माँ बेचारी अपने बूढ़े तन से आजीविका का भार कब तक ढोती ।कई जगह धक्के खाने के बाद ये नौकरी उसे मिली थी तो अब माँ उसका साथ छोड़ गई थी ।जब तक माँ थी तो जो हाथ उसे आशीष के लिये उठते थे आज उन्ही लोगों की नजरों में हवस नजर आने लगी थी । समय सब कुछ बदल देता है करीबी से करीबी रिश्ता भी खोखला नजर आने लगता है । नीरज उसका सच्चा साथी भी अब उससे मुंह मोड़ने लगा था उसकी ऊंचे रुतबे की चाहत ने उसे गौरी से दूर कर दिया था ।
                                                                      गौरी बहुत हौसले वाली थी परंतु जीवन में एक के बाद एक लगी ठोकर से वह टूट चुकी थी ।वो सब कुछ खत्म कर देना चाहती थी अपना अस्तित्व अपना वजूद ।अब तक वो पुल के पास पहुंच गई थी ।बारिश की नन्ही नन्ही बूंदे पड़नी शूरु हो गई थी खराब मौसम की वजह से सड़क पर आवाजाही भी कम थी ।ये पुल घर से नजदीक ही था अकसर वो अपने घर की खिड़की से पुल के नीचे से गुजरती इस शांत नदी को देखा करती थी मगर आज गौरी के मन की तरह ये भी अशांत थी।गौरी पुल के बीच में रूक कर कुछ क्षण नदी को देखती रही उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए बस दो गीले मोती उस उसकी आँखों से निकल कर कहीं जज़्ब हो गए । उसके कदम उपर उठे तभी उसे एक स्वर सुनाई दिया , दीदी ! कहां जा रही हो मुझे भी साथ ले चलो ना. ...... आज मुझसे मिलने भी नहीं आई ......नाराज हो क्या ? तुम यहां क्यों खड़ी हो........ मुझे पता है तुम्हें बारिश बहुत पसन्द है पर तुम तो हमेशा मुझे भी साथ लाती हो भीगने के लिये .........नन्हा मन न जाने कितने सवाल कर बैठा ।गौरी जो एक क्षण पहले अपनी जिन्दगी खत्म करने वाली थी आत्मग्लानी से भर गई कि वो अपनी परेशानी में नीशु को कैसे भूल गई .........नीशु एक अनाथ लड़की थी जो उसके पड़ोस में अपने चाचा के पास रहती थी जो अकसर नशे में चूर रहता था ।नीशु का ज्यादा समय गौरी के साथ बीतता था ।गौरी ने आगे बढ़कर नीशु को अपने सीने से लगाकर कहा........................................मैं अब तुम्हें कभी अकेला छोड़ कर नहीं जाऊँगी ..........मैं तुम्हारा सहारा बनूँगी.................तुम्हें दूसरी गौरी नहीं बनने दूंगी ।नई चेतना के साथ बारिश की रिमझिम में गौरी के कदम नीशु को साथ लिये घर की ओर बढ़ने लगते हैं ……………………..



                                                                                                              सुमन ‘मीत’

रविवार, 13 जून 2010

जिन्दगी......... एक नदी

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जिन्दगी एक नदी की तरह है जो बस चलती जाती है कभी तेज तो कभी आहिस्ता1 नदी की तरह जिन्दगी भी कभी रुकती नही, रुक जाते हैं तो बस इंसान शायद हमारी फितरत ही ऐसी है कि हमारे जज्बात किनारे की रेत की तरह पानी के बहाव मे नही बह जाते अपितू नदी के सीने मे उभरी शिला की तरह जड़ होते हैं, स्थिर होते हैं1 फिर जिन्दगी की रफ्तार से उत्पन्न कम्पन धीरे धीरे उसमे चेतना जगाती है और चेतन मन उस शिला पर बैठ कर बहाव को रोक लेना चाहता है पर नादान नही जानता की कल जब जिन्दगी क बहाव बढ़ जायेगा तो उसका अस्तित्व ही मिट जायेगा जिन्दगी उसे रौन्द कर बस चलती जायेगी नहीं देखेगी कि रास्ते पर जज्बात बिखरे जाते हैं बस कुछ निशान से दे जायेगी अपने होने का और जब बहाव कम होने पर वह उभरेगा तो बहुत कुछ होगा और जो हमने पाया होगा कुछ मलिन सा रौंदा हुआ जिंदगी के उस बहाव से जो अभी दूर किसी और शिला पर जाकर थोड़ा रुक कर आगे बह गया........


                                                                                                 सुमन 'मीत'

शुक्रवार, 14 मई 2010

आस्था की डोर – चैरा

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हिम का आंचल यानि हिमाचल के कुल्लू-मनाली, शिमला, डलहौजी आदि विख्यात पर्यटन स्थलों को तो आम तौर पर सैलानी जानते ही हैं लेकिन इस हिमाचल में कहीं कुछ ऐसे भी अनछुए स्थल हैं जहां सैलानी अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे ही एक स्थल पर मुझे पिछले साल जून में जाने का मौका मिला। इस स्थल का नाम है “चैरा” देव माहूँनाग का मूल स्थान ।इस स्थान की विशेषता यह है कि यहां स्थित माहूँनाग जी के मन्दिर का दरवाजा हर महिने की संक्रांति को ही खुलता है और यही नहीं उसे खोलने के लिये बकरे की बलि भी देनी पड़ती है यह जानकर मन में बहुत उत्सुकता हुई और हमने संक्रांति के समय वहां जाने का प्रोग्राम बनाया 1 यह स्थान हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के करसोग उपमंडल में है। तो चलिए चलते हैं चैरा की अविस्मणीय यात्रा पर। जो रहस्य, रोमांच, मस्ती, व साहस से परिपूर्ण है।
                                                  मंडी
 हमारी यात्रा शुरू होती है मंडी शहर से । व्यास नदी के किनारे स्थित ये मंडी शहर कुल्लू मनाली के रास्ते में ही है। मंडी से हमने अपनी यात्रा टाटा सूमों पर शुरू की। क्योंकि जिस स्थान पर हम जा रहे थे वहां छोटी कार ले जाना संभव नहीं था। यात्रा में जोखिम और कठिनाईयां भी होंगी , इसकी जानकारी हमने तभी हासिल कर ली थी जब हम चैरा घूमने का प्रोग्राम बना रहे थे। यह एक पारिवारिक यात्रा थी और हमारे साथ 4 छोटे बच्चे भी थे जिनकी आयु 5 से 13 तक की थी। सफर शुरू हुआ , धीरे धीरे गंतव्य की ओर कदम बढ़ने लगे । करीब 30 कि.मी. के सफर के बाद बहुत ही सुन्दर गांव आया “चैल चौक” यहाँ पर चील के हरे भरे जंगल दिखे तो शिथिल पड़ी आँखों को तरलता का भान हुआ । वहाँ पर चाय पीकर आगे की यात्रा आरम्भ की । धीरे धीरे गाड़ी उस पहाड़ी रास्ते पर चल रही थी और हमारी आँखें खिड़की से बाहर प्राकृतिक सुन्दरता की गलियों में विचरण कर रही थी । गर्मियों के दिन थे सूरज अपने पूरे सरूर पर था परंतु कहीं पर वृक्ष इतने घने थे कि सूरज की किरणें भी उनसे रास्ता मांगती प्रतीत होती थी । आगे एक के बाद एक ठहराव आते गये जिनमें चुराग,पांगणा,चिंडी आदि प्रमुख हैं । चिन्डी का रेस्ट हाऊस एक ऐसा आराम गृह है जो शरीर के साथ साथ रूह को भी सकून देता है क्योंकि यहां चारों ओर देखने पर नैसर्गिक सुन्दरता नज़र आती है । अब धीरे धीरे गंतव्य से दूरी घटने लगी थी और मंजिल को देखने की चाहत बढ़ने लगी थी क्योंकि अभी तक वो अनदेखा स्थान सिर्फ हमारी कल्पनाओं में था और जैसे कल्पना का पंछी झट से उड़ कर गगन को छू लेना चाहता है वैसे ही हमारा मन भी उस स्थान से जुड़े पहलुओं को जानने के लिये बेचैन था । अंत में हम करसोग पहुँच जाते हैं और वहां पर स्थित ममलेश्वर महादेव और कामाक्षा देवी के दर्शन करते हैं । सच मानो तो यात्रा तो अब शुरु होती है । वहां से 2-3 कि.मी. आगे जाने पर ‘करोल’ नाम का गांव आता है और यहां पर गाड़ी छोड़ कर सारा सामान अपने साथ लेकर हम अपनी पगयात्रा शुरू करते हैं चैरा की ओर । धीरे-धीरे कदम बढ़ने लगते है गंतव्य की ओर , रास्ते के नाम पर सिर्फ 3 फ़ुट की पगडंडी थी कहीं पर सीधी कहीं पर घुमावदार । करीब 2 पहाड़ इसी पगडंडी द्वारा तय करने के बाद एक घर नज़र आने लगता है प्यासे होठों को तरलता का आभास होने लगता है क्योंकि गर्मी के मौसम होने के कारण प्यास अधिक लग रही थी । अब तक हमारे पास साथ में लाया हुआ पानी खत्म हो चुका था । उस घर के लोगों ने हम अपरीचित जनों का खुले दिल से स्वागत किया और पीने को पानी दिया । कुछ देर आराम करके फिर से चलना शुरू किया तो कुछ दूरी तय करने के बाद इस यात्रा का अंतिम आश्रय एक छोटी सी दुकान आई जहाँ पर जरूरत की कुछ चीजें ही उपलब्ध थी । हमने भी अपने सामान को टटोल कर जरूरत की सभी चीजों का जायजा लिया क्योंकि इसके बाद सफर में हमें अपने पास रखी हुई चीजों पर ही निर्भर रहना था । वहां से एक नाले के साथ-2 नीचे चलते – चलते हम “अमला विमला” खड्ड में पहुंच गए । अभी मंजिल तक पहुंचने के लिये इसी खड्ड को हमें 14 बार लांघना था । यहां पर दूरभाष से भी सम्पर्क कट जाता है और रह जाते है सिर्फ हम , प्रकृति के मनभावन नजारे और हमारे विचार जो खुले आसमां के नीचे पहाड़ों की ऊंची ऊंची चोटियों पर किसी बादल की तरह उमड़ते घुमड़ते हुए एक अद्भुत अलौकिक आनंद की ओर ले जाते हैं ।
यहां प्रकृति हर कदम पर बिल्कुल नए रंग दिखा रही थी । कहीं पर पहाड़ बहुत हरे भरे थे तो कहीं पर बस पत्थर की बनावट सी प्रतीत होती थी1उन पहाड़ो में कुछ कन्दराएं थी जो उन लोगों के लिये रहने का ठिकाना थी जो अपने पशुओं,भेड़ बकरियों को चराने के लिये कई दिनों घर से बाहर रहते हैं । इसी जगह पर एक तूफानी चक्रवात ने हमें घेर लिया और हम पत्तों की तरह लहराते हुए गिर पड़े तब यही कन्दराएं हमारा सहारा बनी । कुछ दूरी तय करने पर केले का बागीचा नजर आया क्रमबद्ध अनेक केले के पेड़ । हम इस वक्त तक 3 बार खड्ड पार कर चुके थे और पानी की धारा के साथ-2 सफर करते करते ये पहाड़, ये पानी की हलचल, चट्टाने हमारे साथी बन गए थे अब खड्ड को पार करते हुए डर नही अपितु आनन्द की अनुभूति होने लगी थी ।
यात्रा का हर पहलू रोमांच से भरपूर हो तो अपना ही आनन्द है । ऐसे ही पानी की धारा के साथ साथ सफर चलता रहा बीच में एक नज़ारा अनुपम था । वहां के स्थानीय लोगों द्वारा सिंचाई के लिये पानी को एकत्रित किया गया था और बीच में 1-2 फुट की दूरी पर पत्थर रख कर चलने के लिये रास्ता बनाया गया था । छोटे बच्चों के साथ उस स्थान पर थोड़ी कठिनाई महसूस हुई परंतु जाने क्या था कि ये नन्हे बालक इतने कठिन रास्ते पर भी मस्ती के साथ चल रहे थे शायद ये वो दैवीय शक्ति थी जिसके आगोश में हम जा रहे थे । पानी ठहराव लिये हुए दर्पण की भांति नजर आ रहा था , अपने अन्दर काफी कुछ समेटे बाहर से शांत और अन्दर से उतना व्याकुल । दोनों तरफ के गगनचुम्बी पहाड़ के साये , उस ठहरे पानी में प्रतिबिम्ब बनाए , एक दम उन्नत खड़े थे आकाश की ओर और पानी उनकी विशालता को अपने अन्दर समेटे मौन था ।
 हम बस आगे बढ़ते जा रहे थे अभी प्रकृति काफी रहस्यों के उदघाटन करने वाली थी । आगे बढ़ने पर पहाड़ का अनोखा रूप मिला बस मिट्टी की रंगत सी दिखती थी नीचे पानी के बहाव से पहाड़ घिस गए थे और बीच में ऐसे प्रतीत होते थे मानों पत्थरों की चिनाई करके एक दीवार सी बनाई गई हो । एक पल में पहाड़ की टूटन का आभास होता था तो अगले पल पत्थरों के जुड़ाव का । पहाड़ ने ये रूप कैसे पाया ये सोच कर हैरानगी होती है । इंसान अपनी कृति पर कितना ही नाज़ करे परंतु प्रकृति का मुकाबला नहीं कर सकता ।
खड्ड आर पार करने का सिलसिला यूं ही चलता रहा और ऐसे ही रास्ता कटता रहा बहुत सारे स्मरणीय पलों के साथ और मंजिल के अंतिम पडाव के नज़दीक पहुँचने पर देखते हैं कि वहां फिर से केले का बगीचा है ऐसा प्रतीत हुआ मानो वहां भगवान विष्णु का साक्षात वास हो परंतु जब खेतों पर नजर डाली तो वो खाली थे शायद सुविधाओं के अभाव के कारण ऐसा था । अब अंत में जिस खड्ड को हम चट्टानों से पार करते आये थे उसे हमने एक छोटे से पुल से पार किया और पहुँच गए ‘देव माहूँनाग’ के मूल स्थान ‘चैरा’ । जिसके लिये 4 घण्टे की पगयात्रा करके आये थे ।मन्दिर का द्वार बन्द था जो अगले दिन सक्रान्ति को खुलना था । मन्दिर के साथ ही दो कमरे थे जिनका फर्श लकड़ी का था और दिवारें मिट्टी की । ये हमारा रात का आश्रय स्थल था । यह 4-5 घरों का ही गांव था जहां सुविधाओं की बहुत कमी थी फिर भी वहां के लोगों ने हमें कम्बल वगैरा दे दिये । मौसम का मिज़ाज कुछ बदला सा था अब हल्की हल्की बारिश होने लगी थी फिर भी इस जगह पर गर्मी बहुत अधिक थी । हमने साथ में लाया हुआ खाना खाया और सो गए क्योंकि सफर लम्बा था और थकान से भरा भी ।
सुबह उसी खड्ड में मुंह हाथ धोने के बाद देव दर्शन के लिये गए । मन्दिर के अन्दर गए तो देखा कि एक और चान्दी का छोटा सा द्वार है जिस पर साँप निर्मित थे। इस चान्दी के द्वार के आगे लकड़ी के खम्बों पर टिका थड़ा सा बना था जिस पर गोबर से लिपाई की गई थी। पुजारी ने बताया कि इस चान्दी के द्वार के भीतर एक गुफा है जिसमें एक गज जमीन में गाड़ी है 1 जब हमने गज के बारे में पूछा तो उन्होने बताया कि देव “माहूंनाग” और देव “धमूनीनाग” दो देवता इस खड्ड के दोनों ओर रहते थे जब और सभी देवता पहाड़ों के उपर रहने चले गए तो इन दोनों ने निर्णय लिया कि ये अपने मूल स्थान में ही निवास करेंगे । परंतु देव “धमूनीनाग” अपने निर्णय को भूल कर पहाड़ के उपर रहने चले गये तब देव “माहूंनाग” ने ये गज गाड़ कर अपने पहाड़ को उनसे भी ऊंचा कर दिया ।
ये “माहूंनाग” दानी राजा “कर्ण” हैं और कोई भी इनके द्वार से खाली नहीं जाता है ये सबकी खाली झोली भरते हैं । अनेक दम्पती संतान की चाह लिये इनके द्वार पर मन्नत मांगते हैं और चाह पूरी होने पर बकरे की बलि देते हैं । जो कोई भी सच्चे मन से शीश नवाता है उसे उस चांन्दी के दरवाजे से नाग के फुंकारने की आवाज सुनाई देती है । उस दिन एक दम्पति अपनी मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने आये थे । पूजा शुरू की गई फिर बकरे को लाया गया तो द्वार खुला । हमने भी उस गज के दर्शन किए तो हमारी कल्पना के दर्पण पर हकीकत की तस्वीर उभर आई । पूजा समाप्त होने के बाद पुजारी ने जिसे स्थानीय भाषा में “गूर” कहा जाता है देव की बातें लोगों तक पहुँचाई । उसके बाद पास में स्थित “हत्या माता” की पूजा की गई हमने अपने जीवन में पहली बार हत्या माता के बारे सुना । उन लोगों के अनुसार हत्या माता की पूजा से आप जीवन में की गई हत्या के दोष से मुक्त हो जाते हैं । फिर मन्दिर के बाहर स्थापित “मसाणू” जी की पूजा की गई जो इन पहाड़ी देवताओं के संगी साथी माने जाते हैं ।
अंत में वहां के लोगों से विदा लेकर हम अपने घर की ओर रवाना हो गए अनेक सवालों से घिरे मन के साथ कि क्या सच में कोई देव आपको संतान दे सकता है ? क्या किसी जीव की जिन्दगी इतनी सस्ती है कि आप अपने लिये उसकी बलि चढ़ा दें ? परंतु सच कहें तो देवालय में बैठ कर कोई प्रश्न नहीं उठता मन में । इंसान शून्य में विलीन हो जाता है , अंतस की गहराई में उतरने लगता है , मात्र कुछ समय के लिये ही सही अपनी सांसारिक दुनिया से दूर हो जाता है । शायद यही वो आस्था की शक्ति है जो आज के इस वैज्ञानिक युग मे भी हम इन संस्कृतियों से जुड़े हैं और बन्धे हैं भक्ति की डोर से ...............


इस स्थान जाने का उपयुक्त मौसम ---अप्रैल से जून

                                                                                                                                         सुमन 'मीत'

रविवार, 9 मई 2010

ओशो...........एक विचार

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अपने ब्लॉग की शुरूआत ‘ओशो’ के विचार से कर रही हूँ ।जीवन दर्शन में उनके दृष्टिकोण से काफी प्रभावित हूँ ।



आकाश को खिड़कियों से मत देखो ।
क्योंकि , खिड़कियां असीम आकाश को भी सीमाएं दे देती है ।

और , सत्य को शब्दों से नहीं ।
क्योंकि , शब्द निराकार को आकार दे देते हैं ।
आकाश को जानना हो, तो खुले आकाश के नीचे आ जाओ ।
अपनी-अपनी खिड़कियों को छलांगकर ।
और सत्य को जानना हो तो निशब्द में लीन हो जाओ ।
अपने-अपने शब्दों को त्यागकर ।
और सोचो मत करो और देखो।
क्योंकि, सोचने मात्र से खिड़कियों से छलांग नहीं लगती है ।
और न ही शब्दों का अतिक्रमण होता है ॥


.............“ओशो”.............