शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

कितना अवसरवादी हो गया है इंसान.................

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 आज इंसान कितना अवसरवादी हो गया है ।हर कोई बस दूसरे को नीचा दिखाने की फिराक में है । आज के इस अन्धे युग में इंसान अपनी इंसानियत तक भूल गया है हर कोई बस अन्धी दौड़ में भागे जा रहा है बिना ये जाने कि वो राह उसकी मंजिल तक जाती भी है या नहीं । उसे ये सोचने की फुर्सत ही कहाँ है वो तो बस ये देखता है कि दूसरा आगे जा रहा है और मैं उसे पीछे कैसे धकेल सकता हूँ ।बस यही सोच रह गई है इंसान की .............।अपनी इस सोच से वो अपनी मंजिल की राह भी भटक जाता है क्योंकि अपनी मंजिल की राह में तो उसने कदम बढ़ाया ही नहीं होता वो तो बस दूसरों की राहों मे नजरें लगाए रहता है कि कब दूसरा आदमी कदम बढ़ाए और मैं उसकी राह में रोड़े डाल दूँ.......।मन बहुत खिन्न होता है जब भी ऐसे लोगों को देखती हूँ ........।हमारे सभ्य समाज की सोच कितनी बदल गई है शिक्षा तो इंसान के जीवन में नई क्रांति लाती है उसके सोच के दायरे को बढ़ाती है ना कि उसे इतना संकीर्ण बना देती है कि उसे बोध ही नही होता कि कांटे बो कर कभी भी फूल नहीं खिला करते................ ।



मुझे याद है हिन्दी की कहावतें

*लालच बुरी बला है ।
*ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनका भला करते हैं जो अपना भला आप करते है।

परंतु अवसरवादी इंसान के लिये कहावतें कुछ इस तरह होनी चाहिये

*अवसरवादी होना भी एक कला है ।
*बैमानी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनकी सहायता करते हैं जो दूसरों का बुरा हाल करते हैं ।
                                                                                         
                                                                                            सुमन ‘मीत’








रविवार, 25 जुलाई 2010

‘महाकाल’ .......... जहाँ जलती थी रोज एक चिता

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अभी हाल ही में एक पारिवारिक यात्रा करके आई हूँ और आप सब से उसका अनुभव साझा करना चाहती हूँ ।

मंडी से करीब 80 कि.मी. की दूरी पर एक जगह है बैजनाथ जो शिमला  पठानकोट मार्ग के बीच में आती है ।वहां से करीब 3 कि.मी. लढ़भड़ोल मार्ग पर जाने पर एक धार्मिक स्थल है ‘ महाकाल’ ।काफी बड़े परिसर में फैले इस स्थल में 3 मन्दिर हैं जिसमें एक स्वयंभू शिवलिंग का प्राचीन मन्दिर है और एक दुर्गा माता का ।तीसरा मन्दिर शनि देव का है जिसके 12 स्तम्भ हैं जिन पर 12 राशियां अंकित हैं ।काले ग्रेनाइट से बने इस मन्दिर की छटा देखते ही बनती है । हमने देखा कि उन स्तम्भों पर लाल डोरी (मौली) बान्धी गई है तो मन में उससे सम्बन्धित बातें जानने की इच्छा हुई । पुजारी के अनुसार अपनी राशि वाले स्तम्भ पर डोरी बान्धने से अनिष्ट ग्रहों की शांति होती है ।वहां अभिलेख पर लिखे शब्दों के अनुसार प्राचीन में जालन्धर नामक समुद्र पुत्र दैत्य भगवान शिव का अनन्य भक्त था जिसने कठिन तप से शिव से मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था परंतु काल पर विजय प्राप्त करके अंहकार वश उसने ऋषि मुनियों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया तब देव अनुरोध पर भगवान शिव ने महाकाल रूप धारण कर उस दैत्य का वध किया था।तब से यह महाकाल के नाम से प्रसिद्ध है।कहा जाता है कि पहले यहाँ हर रोज एक चिता जरूर जलती थी जिसमें रोज कोई चिता न हो तो वहां घास का (पुला) गठ्ठा जलाया जाता था।
                भगवान शिव के बहुरूप के दर्शन कर आत्मिक शांति का अनुभव होता है एक ओर जहाँ ये भोले बाबा है जो भक्ति से जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर रूद्र देव भी जो दुर्जनों का नाश करने के लिये काल देवता ‘महाकाल’ बन जाते हैं ..............


मंदिर का परिसर


मेरे भांजे और भांजी
शनि देव की मूर्ति

स्तम्भ पर राशि
मंदिर के दर्शन
स्वयभू शिवलिंग
दुर्गा माता
प्राचीन शिव मंदिर
सोचा अपने ग्रहों की शांति भी कर ले (मेरी मम्मी )
शनि देव की शिला जहाँ तेल ,तिल,माह चढ़ाये जाते हैं
 
धूप बहुत थी छाया कम
मेरी बड़ी दीदी और बच्चे

एक दूसरे की ओर मुह किये भगवान् शिव और दुर्गा के प्राचीन मंदिर
आज भी एक चिता जला रही थी

शनि देव की छत्रछाया में हमारा परिवार

मंदिर में बना जल कुंड
प्रकृति के नज़ारे

बच्चों की मस्ती

मेरे पापा ,बच्चे ओर ड्रावर

रोज की भागदौड़ भरी जिन्दगी से कुछ राहत
मेरी मम्मी ,छोटी दीदी .बच्चे (एक मित्र )
मस्ती का आलम
घर की तरफ वापसी .............................




रविवार, 11 जुलाई 2010

नई चेतना

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मेरी पहली कोशिश कहानी लेखन में

धीरे धीरे पुल की ओर बढ़ते गौरी के कदम उसके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों को सामने ला रहे थे ।आकाश में बादल बस बरसने ही वाले थे और लगता मानो ये मेघ इस प्यासी धरती पर न्यौछावर होने को आतुर हैं पर..... गौरी वो तो बस चलती ही जा रही थी ।आज उसने पक्का निश्चय कर लिया था कि रोज की इस घुटन भरी जिन्दगी से मुक्ति पा लेगी खत्म कर देगी ये जिन्दगी से जद्दोजहद और बस सब शांत हो जायेगा हमेशा के लिये।
                                                                  कुछ रोज हुए उसकी इकलौती सहारा उसकी माँ भी उसे तन्हा छोड़ कर दूसरी दुनिया में चली गई थी ,अब गौरी के जीवन में सिवा तन्हाई के कुछ भी न था पहाड़ सी लम्बी जिन्दगी वो किसके सहारे जीती ।वो एक छोटी सी फैक्टरी में काम करती थी कालेज के बाद अच्छे अंक होने के बावजूद पैसे के अभाव से वो आगे नहीं पढ़ सकी ।माँ बेचारी अपने बूढ़े तन से आजीविका का भार कब तक ढोती ।कई जगह धक्के खाने के बाद ये नौकरी उसे मिली थी तो अब माँ उसका साथ छोड़ गई थी ।जब तक माँ थी तो जो हाथ उसे आशीष के लिये उठते थे आज उन्ही लोगों की नजरों में हवस नजर आने लगी थी । समय सब कुछ बदल देता है करीबी से करीबी रिश्ता भी खोखला नजर आने लगता है । नीरज उसका सच्चा साथी भी अब उससे मुंह मोड़ने लगा था उसकी ऊंचे रुतबे की चाहत ने उसे गौरी से दूर कर दिया था ।
                                                                      गौरी बहुत हौसले वाली थी परंतु जीवन में एक के बाद एक लगी ठोकर से वह टूट चुकी थी ।वो सब कुछ खत्म कर देना चाहती थी अपना अस्तित्व अपना वजूद ।अब तक वो पुल के पास पहुंच गई थी ।बारिश की नन्ही नन्ही बूंदे पड़नी शूरु हो गई थी खराब मौसम की वजह से सड़क पर आवाजाही भी कम थी ।ये पुल घर से नजदीक ही था अकसर वो अपने घर की खिड़की से पुल के नीचे से गुजरती इस शांत नदी को देखा करती थी मगर आज गौरी के मन की तरह ये भी अशांत थी।गौरी पुल के बीच में रूक कर कुछ क्षण नदी को देखती रही उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए बस दो गीले मोती उस उसकी आँखों से निकल कर कहीं जज़्ब हो गए । उसके कदम उपर उठे तभी उसे एक स्वर सुनाई दिया , दीदी ! कहां जा रही हो मुझे भी साथ ले चलो ना. ...... आज मुझसे मिलने भी नहीं आई ......नाराज हो क्या ? तुम यहां क्यों खड़ी हो........ मुझे पता है तुम्हें बारिश बहुत पसन्द है पर तुम तो हमेशा मुझे भी साथ लाती हो भीगने के लिये .........नन्हा मन न जाने कितने सवाल कर बैठा ।गौरी जो एक क्षण पहले अपनी जिन्दगी खत्म करने वाली थी आत्मग्लानी से भर गई कि वो अपनी परेशानी में नीशु को कैसे भूल गई .........नीशु एक अनाथ लड़की थी जो उसके पड़ोस में अपने चाचा के पास रहती थी जो अकसर नशे में चूर रहता था ।नीशु का ज्यादा समय गौरी के साथ बीतता था ।गौरी ने आगे बढ़कर नीशु को अपने सीने से लगाकर कहा........................................मैं अब तुम्हें कभी अकेला छोड़ कर नहीं जाऊँगी ..........मैं तुम्हारा सहारा बनूँगी.................तुम्हें दूसरी गौरी नहीं बनने दूंगी ।नई चेतना के साथ बारिश की रिमझिम में गौरी के कदम नीशु को साथ लिये घर की ओर बढ़ने लगते हैं ……………………..



                                                                                                              सुमन ‘मीत’