रविवार, 11 जुलाई 2010

नई चेतना

मेरी पहली कोशिश कहानी लेखन में

धीरे धीरे पुल की ओर बढ़ते गौरी के कदम उसके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों को सामने ला रहे थे ।आकाश में बादल बस बरसने ही वाले थे और लगता मानो ये मेघ इस प्यासी धरती पर न्यौछावर होने को आतुर हैं पर..... गौरी वो तो बस चलती ही जा रही थी ।आज उसने पक्का निश्चय कर लिया था कि रोज की इस घुटन भरी जिन्दगी से मुक्ति पा लेगी खत्म कर देगी ये जिन्दगी से जद्दोजहद और बस सब शांत हो जायेगा हमेशा के लिये।
                                                                  कुछ रोज हुए उसकी इकलौती सहारा उसकी माँ भी उसे तन्हा छोड़ कर दूसरी दुनिया में चली गई थी ,अब गौरी के जीवन में सिवा तन्हाई के कुछ भी न था पहाड़ सी लम्बी जिन्दगी वो किसके सहारे जीती ।वो एक छोटी सी फैक्टरी में काम करती थी कालेज के बाद अच्छे अंक होने के बावजूद पैसे के अभाव से वो आगे नहीं पढ़ सकी ।माँ बेचारी अपने बूढ़े तन से आजीविका का भार कब तक ढोती ।कई जगह धक्के खाने के बाद ये नौकरी उसे मिली थी तो अब माँ उसका साथ छोड़ गई थी ।जब तक माँ थी तो जो हाथ उसे आशीष के लिये उठते थे आज उन्ही लोगों की नजरों में हवस नजर आने लगी थी । समय सब कुछ बदल देता है करीबी से करीबी रिश्ता भी खोखला नजर आने लगता है । नीरज उसका सच्चा साथी भी अब उससे मुंह मोड़ने लगा था उसकी ऊंचे रुतबे की चाहत ने उसे गौरी से दूर कर दिया था ।
                                                                      गौरी बहुत हौसले वाली थी परंतु जीवन में एक के बाद एक लगी ठोकर से वह टूट चुकी थी ।वो सब कुछ खत्म कर देना चाहती थी अपना अस्तित्व अपना वजूद ।अब तक वो पुल के पास पहुंच गई थी ।बारिश की नन्ही नन्ही बूंदे पड़नी शूरु हो गई थी खराब मौसम की वजह से सड़क पर आवाजाही भी कम थी ।ये पुल घर से नजदीक ही था अकसर वो अपने घर की खिड़की से पुल के नीचे से गुजरती इस शांत नदी को देखा करती थी मगर आज गौरी के मन की तरह ये भी अशांत थी।गौरी पुल के बीच में रूक कर कुछ क्षण नदी को देखती रही उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए बस दो गीले मोती उस उसकी आँखों से निकल कर कहीं जज़्ब हो गए । उसके कदम उपर उठे तभी उसे एक स्वर सुनाई दिया , दीदी ! कहां जा रही हो मुझे भी साथ ले चलो ना. ...... आज मुझसे मिलने भी नहीं आई ......नाराज हो क्या ? तुम यहां क्यों खड़ी हो........ मुझे पता है तुम्हें बारिश बहुत पसन्द है पर तुम तो हमेशा मुझे भी साथ लाती हो भीगने के लिये .........नन्हा मन न जाने कितने सवाल कर बैठा ।गौरी जो एक क्षण पहले अपनी जिन्दगी खत्म करने वाली थी आत्मग्लानी से भर गई कि वो अपनी परेशानी में नीशु को कैसे भूल गई .........नीशु एक अनाथ लड़की थी जो उसके पड़ोस में अपने चाचा के पास रहती थी जो अकसर नशे में चूर रहता था ।नीशु का ज्यादा समय गौरी के साथ बीतता था ।गौरी ने आगे बढ़कर नीशु को अपने सीने से लगाकर कहा........................................मैं अब तुम्हें कभी अकेला छोड़ कर नहीं जाऊँगी ..........मैं तुम्हारा सहारा बनूँगी.................तुम्हें दूसरी गौरी नहीं बनने दूंगी ।नई चेतना के साथ बारिश की रिमझिम में गौरी के कदम नीशु को साथ लिये घर की ओर बढ़ने लगते हैं ……………………..



                                                                                                              सुमन ‘मीत’

17 comments:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मार्मिक पर आशा और विश्वास की पुनः प्राप्ति और जीवन का संबल ढूँढने और पाने की तलाश करती अच्छी कहानी है ....

Suman ने कहा…

nice

शोभा ने कहा…

अति सुन्दर।

M VERMA ने कहा…

कहानी लेखन की पहली कोशिश और फिर भी बहुत उम्दा.
कहानियाँ भी लिखती रहें

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया कहानी लगी..एक हताशा की दुनिया से निकल कर एक कारण मिला जिन्दगी जीने का...और कहानियाँ लिखिये. अच्छा लेखन है. शुभकामनाएँ.

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब, बहुत बढ़िया लगी कहानी, आपसे ऐसी ही और कहानी की उम्मीद करता हूँ, बधाई स्वीकार करें .

दीपक 'मशाल' ने कहा…

अच्छा प्रयास है सुमन जी.. आगे भी लिखती रहिये बेहतर ही होगा.. यहाँ कई लोग हैं भी सिखाने के लिए.. मेरा बस यही सुझाव है कि संवाद को inverted commas में लिखें..

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

आज पहली बार आपकी कलम का ये रूप देखा जो उम्दा और मनभावन है.
कहानी पूरी फ्लोव में है...कहीं कोई झोल नहीं है. सशक्त लेखन है.आगे बढते रहिये.

Deepak Shukla ने कहा…

सुमन जी,

आज प्रथम बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ और सच मैं बहुत अच्छा लगा की आप लेखन की हर विधा मैं पारंगत हैं...वैसे ये तो आपके परिचय से ही स्पष्ट है की आपका क्षेत्र कविता है और जो कवी होता है वो तो कहानी भी लिख ही सकता है...

प्रस्तुत कहानी बहुत प्रभावशाली ढंग से लिखी गयी है और सुन्दर बन पड़ी है... जीवन जटिल भले हो लेकिन उसे जीना ही बेहतर है...पलायन करने से तो बेहतर है की हालत का सामना किया जाए...

सुन्दर कहानी...

दीपक...

JAGDISH BALI ने कहा…

howmuch cruel life may appear to be, yet it cannot be aimless. Nice and motivating.

निर्झर'नीर ने कहा…

यकीन मानिये आपका पहला प्रयास सार्थक ही नहीं पूरी तरह से परिपक्व भी है इतना मर्म की आँखें नम हो गयी ऐसा लगा जैसे कोई चलचित्र देख रहा हूँ आप लघु कथाएं लिखिए आपके लेखन के चाहने वालों की कमी नहीं है जो भी आपकी कहानी के लिया लिखा है मन से लिखा है इसलिए नहीं की आप मेरे ब्लॉग तक आई और मेरे शब्दों को सराहा .

sandhyagupta ने कहा…

Jab pehla prayas itna prabhavi hai to age to.....

shubkamnayen.

अल्पना वर्मा ने कहा…

pahali kahani hi bahut achchee likhi hai ....

-pravaah bana raha.
-kahani prabhaavi aur marmsparshi lagi.

Science Bloggers Association ने कहा…

मन को छू गयी आपकी कहानी। बधाई।
................
नाग बाबा का कारनामा।
महिला खिलाड़ियों का ही क्यों होता है लिंग परीक्षण?

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

पहला प्रयास ही उत्तम...बधाई. कभी हमारे 'शब्द-शिखर' पर भी पधारें.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपका प्रयास सराहनीय है!

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

mujhe ye kahani bahut acchi lagi suman ... there is hope and faith ..

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