बुधवार, 18 अगस्त 2010

"दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई " – गुलज़ार & जगजीत सिंह

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गुलज़ार जी एक बेमिसाल लेखक हैं और जब जगजीत सिंह जी उनके लफ्जों को सुर देते हैं तो वो एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं .................


उनकी एलबम मरासिम से एक गज़ल..............


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई.........


आईना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई...........


पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई.............


देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ..............


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई.........





रविवार, 8 अगस्त 2010

टिप्पणी देना भी एक कला है ।

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टिप्पणी देना भी एक कला है ।जिस तरह अपने विचारों , अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोकर हम लिखते हैं वो हमारी अपनी अनुभूती होती है अपने विचारों के प्रति .............वो विचार जो धीरे धीरे मानसपटल पर विचरते हुए लेखनी से कोरे कागज में रंग भर देते हैं ।उसी तरह हमारे भावों का प्रतिरूप हमें टिप्पणियों के रूप में मिलता है जो हमारे लेखन को सार्थक बना देता है ,हमारे लेखन की रंगत को और बढ़ा देते हैं । सच में ये महसूस करने की बात है कि कुछ ब्लॉगर बहुत अच्छी टिप्पणी करते हैं अच्छी से मेरा मतलब प्रशंसा करने वाली टिप्पणियों से नहीं है बल्कि सकारात्मक दिशा में ले जाने वाली से है। कभी कभी पोस्ट पर टिप्पणियों का प्रभाव हावी लगता है।मुझे खुद महसूस हुआ है कि टिप्पणी से मिले सुझाव आपके लेखन को नया आयाम देते हैं क्योंकि कभी कभी ऐसा होता है कि हम अपना 100% नहीं दे पाते चूक हो जाती है । कभी समय का अभाव ,कभी शब्दों की अभाव और हम अपने लेखन का विश्लेषण नहीं कर पाते ,तब ब्लॉगर मित्रों द्वारा दिये गये सुझाव आत्मविश्लेषण करवाते हैं कहां क्या चूक हो गई इसका आभास होता है और सृजनशीलता को नया आयाम मिलता है।मैने शुक्रगुजार हूँ आप सभी की जिन्होनें मेरे लेखन को सराहा और उचित सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन किया.............!!





सुमन ‘मीत’