बुधवार, 18 अगस्त 2010

"दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई " – गुलज़ार & जगजीत सिंह

गुलज़ार जी एक बेमिसाल लेखक हैं और जब जगजीत सिंह जी उनके लफ्जों को सुर देते हैं तो वो एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं .................


उनकी एलबम मरासिम से एक गज़ल..............


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई.........


आईना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई...........


पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई.............


देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ..............


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई.........





10 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर गज़ल पढ़वाने, सुनवाने का आभार.

Manav Mehta ने कहा…

bahut bahut bahut pyaari ghazal hai....
aapne hame aaj fir se sun ne ka moka de diya....bahut khoob... :)

sanu shukla ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर...उर्दू के नायब तोहफे गजल को इन दोनों महानुभावों ने लोकप्रिय बनाने में जो योगदान दिया है उसे नकारा ही नहीं जा सकता ..आपका भी शुक्रिया सुन्दर गजल के लिए...!!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब...बस और क्या कहूँ...तारीफ़ के लिए लफ्ज़ ही नहीं हैं...
नीरज

varsha ने कहा…

beautiful.. thanks for sharing

deepakchaubey ने कहा…

बहुत सुंदर ग़ज़ल

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

वाह उम्दा पोस्ट-लाजवाब और बेहतरीन
आभार

मैं परेशान हूँ--बोलो, बोलो, कौन है वो--
टर्निंग पॉइंट--ब्लाग4वार्ता पर आपकी पोस्ट


उपन्यास लेखन और केश कर्तन साथ-साथ-
मिलिए एक उपन्यासकार से

रंजना ने कहा…

बहुत बहुत आभार इस नायाब रचना को सुनवाने और पढवाने के लिए...

कृपया ब्लॉग पेज पर फॉण्ट कलर को थोडा बदल लें,विशेषकर कमेन्ट सेक्शन में...क्योंकि कलर कोम्बिनेशन ऐसा है की आसानी से यहाँ लिखा दीख नहीं रहा...

dimple ने कहा…

और वो तो छूट ही गया...
तुम्हारे गम की डाली होठों में रख ली है मैंने देखो, ये कतरा कतरा ही गल रही है. में कतरा कतरा ही जी रहा हूँ.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

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