सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा......जगजीत&चित्रा

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सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं ...............................................................


देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे -2
मेरी ख़ता मेरी वफा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं .............................................................


जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर -2
भेजा वही कागज उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं ..............................................................


इक शाम की दहलीज पर बैठे रहे वो देर तक -2
आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं
माँगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा नहीं ...............................................................


                                                                                              बशीर बद्र

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

मन के विचार

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कहते हैं जीवन में एक ध्येय लेकर चलना चाहिये एक लक्ष्य लेकर.................ताकि जीवन में कुछ मुकाम हासिल कर सको , कुछ हो आखिर में जो तुम्हारे जीवन की पूंजी होगी जीवन के अंतिम पड़ाव में तुम्हें लगे कि जीवन में जो सोचा वो कर लिया । पर क्या इंसान इस सोच के साथ ज्यादा समय टिक पाता है.........क्या आखिर में वो तृष्णा रहित हो जाता है , क्या उसका चंचल मन ठहर जाता है........वो शून्य मे लीन हो पाता है , शायद नहीं इंसान की इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं होती................। एक कड़ी है बस जो हर इच्छा को........हर अभीप्सा को.....हर चाह को एक दूसरे से जोड़े है एक की पूर्ति दूसरे के होने का सबब बन जाती है बस और कुछ नही होता । भावों का ताना बाना बुनता मन जकड़ लेता है अपने जाल में और हम बस देखते रहते हैं उसके बुने मायाजाल को जो नशवर है.................क्षणिक है....................एक तीव्र हवा का झोंका उसे नष्ट कर देगा , उसका अस्तित्व मिटा देगा । तो क्या वो ध्येय...........वो लक्ष्य......... भी उसके मन की ही उपज नहीं ,एक दबी सी चाह नहीं जो सारी उम्र इंसान का पीछा नही छोड़ती..........हर क्षण उसे जकड़े रहती है अपने बाहुपाश में......................
                                                                                     
                                                                                      सुमन ‘मीत’

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे............(शाहिद मीर & जगजीत सिंह)

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ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा..........................................


तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैनें
आ किसी दिन मेरे अहसास को तयकर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा..........................................

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा.........................................


                                                                               शाहिद मीर