शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे............(शाहिद मीर & जगजीत सिंह)

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा..........................................


तुझको देखा नहीं महसूस किया है मैनें
आ किसी दिन मेरे अहसास को तयकर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा..........................................

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे
या छलकती हुई आँखों को पत्थर कर दे
ऐ खुदा.........................................


                                                                               शाहिद मीर





6 comments:

बेनामी ने कहा…

bahut hi khubsurat rachna...
मेरे ब्लॉग पर इस बार ....
क्या बांटना चाहेंगे हमसे आपकी रचनायें...
अपनी टिप्पणी ज़रूर दें...
http://i555.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html

बेनामी ने कहा…

शानदार ग़ज़ल और उसपर जगजीत सिंह साहब की आवाज़ जैसे सोने पे सुहागा |

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

behtereen prastuti...

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

बेहतरीन भाव...सुन्दर अभिव्यक्ति...बधाई.


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"शब्द-शिखर' पर जयंती पर दुर्गा भाभी का पुनीत स्मरण...

Dr. Amarjeet Kaunke ने कहा…

bahut khusurat....
suman kabhi mere blog par aana

www.amarjeetkaunke.blogspot.com

Udan Tashtari ने कहा…

आभार इस प्रस्तुति का.

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