सोमवार, 28 नवंबर 2011

आखिरी इबारत

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जिंदगी की किताब खोली
देखा !
कितने पन्नें पलट गए
कुछ भरे
कुछ खाली....

कुछ में बैठे हैं शब्द
मेहमां बनकर
और
कुछ में हैं जज्बात
बेजुबान से....

रह गए हैं अब तो
चंद ही पन्ने बाकी 

हूँ इतंजार में
कब लिखेगी मौत
मेरी जिंदगी की
      आखिरी इबारत...........  


सुमन 'मीत' 





रविवार, 6 नवंबर 2011

बेरंग जिंदगी

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क्यूँ जिंदगी हमसे आँख मिचोली करती है

      सुबह खुशी में खिलकर क्यूँ शाम गम में ढलती है

कहते हैं जिंदगी हर पल रंग बदलती है
      
      फिर क्यूँ हमें तस्वीर इसकी बेरंग सी झलकती है.........
                                                                    

                                       सुमन मीत