बुधवार, 21 मई 2014

सरहद से परे





















हदों में मत सिमटना
हदों से फिर सरहदें बनती हैं

उड़ना पंछी सी अलबेली उड़ान
सरहद पार भी जिंदगी पनपती है !!



सु..मन 

12 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (22-05-2014) को अच्छे दिन (चर्चा-1620) पर भी है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ranjana Verma ने कहा…

सरहद पार भी जिंदगी पनपती है !!
बहुत खूबसूरत प्रस्तुति !!

Mithilesh dubey ने कहा…

वाह। लाजवाब।

Meena Chopra ने कहा…

Bahut Khub.

आशा जोगळेकर ने कहा…

सरहद पार भी जिंदगी पनपती है दोनों और।

Kailash Sharma ने कहा…

वाह...लाज़वाब सार्थक सोच...

Saras ने कहा…

बहोत खूब सुमन

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना शनिवार 24 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Vaanbhatt ने कहा…

पंछी और हवाओं को सरहदें कहाँ रोक पायीं हैं...

Onkar ने कहा…

बहुत खूब

अली सैयद ने कहा…

बेशक, इसके लिये हमें अपने अंतस की सीमायें लांघनी होंगी ! अपना आपा खोना होगा ! बेहतर सोच ! अच्छी कविता !

Yogi Saraswat ने कहा…

kya baat hai , bahut badhiya

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