शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

उम्मीद
















चल उम्मीद के तकिये पर 
सर रख कर सोयें 
ख़्वाबों में बोयें 
कुछ जिन्दगी 
क्या मालूम सुबह जब 
आँख खुले 
हर उम्मीद हो जाये हरी भरी !!


सु-मन 

5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-10-2016) के चर्चा मंच "जय जय हे जगदम्बे" (चर्चा अंक-2489) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Nitish Tiwary ने कहा…

सुंदर पंक्तियाँ।

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर.

Digamber Naswa ने कहा…

आमीन ... काश उम्मीद पूरी हो ...

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