शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

कितना अवसरवादी हो गया है इंसान

12 comments
 आज इंसान कितना अवसरवादी हो गया है ।हर कोई बस दूसरे को नीचा दिखाने की फिराक में है । आज के इस अन्धे युग में इंसान अपनी इंसानियत तक भूल गया है हर कोई बस अन्धी दौड़ में भागे जा रहा है बिना ये जाने कि वो राह उसकी मंजिल तक जाती भी है या नहीं । उसे ये सोचने की फुर्सत ही कहाँ है वो तो बस ये देखता है कि दूसरा आगे जा रहा है और मैं उसे पीछे कैसे धकेल सकता हूँ ।बस यही सोच रह गई है इंसान की।अपनी इस सोच से वो अपनी मंजिल की राह भी भटक जाता है क्योंकि अपनी मंजिल की राह में तो उसने कदम बढ़ाया ही नहीं होता वो तो बस दूसरों की राहों मे नजरें लगाए रहता है कि कब दूसरा आदमी कदम बढ़ाए और मैं उसकी राह में रोड़े डाल दूँ।मन बहुत खिन्न होता है जब भी ऐसे लोगों को देखती हूँ ।हमारे सभ्य समाज की सोच कितनी बदल गई है शिक्षा तो इंसान के जीवन में नई क्रांति लाती है उसके सोच के दायरे को बढ़ाती है ना कि उसे इतना संकीर्ण बना देती है कि उसे बोध ही नही होता कि कांटे बो कर कभी भी फूल नहीं खिला करते।



मुझे याद है हिन्दी की कहावतें

*लालच बुरी बला है ।
*ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनका भला करते हैं जो अपना भला आप करते है।

परंतु अवसरवादी इंसान के लिये कहावतें कुछ इस तरह होनी चाहिये

*अवसरवादी होना भी एक कला है ।
*बैमानी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनकी सहायता करते हैं जो दूसरों का बुरा हाल करते हैं ।
                                                                                         
                                                                                            सु-मन








रविवार, 25 जुलाई 2010

‘महाकाल’ जहाँ जलती थी रोज एक चिता

16 comments
अभी हाल ही में एक पारिवारिक यात्रा करके आई हूँ और आप सब से उसका अनुभव साझा करना चाहती हूँ ।

मंडी से करीब 80 कि.मी. की दूरी पर एक जगह है बैजनाथ जो शिमला  पठानकोट मार्ग के बीच में आती है ।वहां से करीब 3 कि.मी. लढ़भड़ोल मार्ग पर जाने पर एक धार्मिक स्थल है ‘ महाकाल’ ।काफी बड़े परिसर में फैले इस स्थल में 3 मन्दिर हैं जिसमें एक स्वयंभू शिवलिंग का प्राचीन मन्दिर है और एक दुर्गा माता का ।तीसरा मन्दिर शनि देव का है जिसके 12 स्तम्भ हैं जिन पर 12 राशियां अंकित हैं ।काले ग्रेनाइट से बने इस मन्दिर की छटा देखते ही बनती है । हमने देखा कि उन स्तम्भों पर लाल डोरी (मौली) बान्धी गई है तो मन में उससे सम्बन्धित बातें जानने की इच्छा हुई । पुजारी के अनुसार अपनी राशि वाले स्तम्भ पर डोरी बान्धने से अनिष्ट ग्रहों की शांति होती है ।वहां अभिलेख पर लिखे शब्दों के अनुसार प्राचीन में जालन्धर नामक समुद्र पुत्र दैत्य भगवान शिव का अनन्य भक्त था जिसने कठिन तप से शिव से मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था परंतु काल पर विजय प्राप्त करके अंहकार वश उसने ऋषि मुनियों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया तब देव अनुरोध पर भगवान शिव ने महाकाल रूप धारण कर उस दैत्य का वध किया था।तब से यह महाकाल के नाम से प्रसिद्ध है।कहा जाता है कि पहले यहाँ हर रोज एक चिता जरूर जलती थी जिसमें रोज कोई चिता न हो तो वहां घास का (पुला) गठ्ठा जलाया जाता था।
                भगवान शिव के बहुरूप के दर्शन कर आत्मिक शांति का अनुभव होता है एक ओर जहाँ ये भोले बाबा है जो भक्ति से जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर रूद्र देव भी जो दुर्जनों का नाश करने के लिये काल देवता ‘महाकाल’ बन जाते हैं ..............


मंदिर का परिसर


मेरे भांजे और भांजी
शनि देव की मूर्ति

स्तम्भ पर राशि
मंदिर के दर्शन
स्वयभू शिवलिंग
दुर्गा माता
प्राचीन शिव मंदिर
सोचा अपने ग्रहों की शांति भी कर ले (मेरी मम्मी )
शनि देव की शिला जहाँ तेल ,तिल,माह चढ़ाये जाते हैं
 
धूप बहुत थी छाया कम
मेरी बड़ी दीदी और बच्चे

एक दूसरे की ओर मुह किये भगवान् शिव और दुर्गा के प्राचीन मंदिर
आज भी एक चिता जला रही थी

शनि देव की छत्रछाया में हमारा परिवार

मंदिर में बना जल कुंड
प्रकृति के नज़ारे

बच्चों की मस्ती

मेरे पापा ,बच्चे ओर ड्रावर

रोज की भागदौड़ भरी जिन्दगी से कुछ राहत
मेरी मम्मी ,छोटी दीदी .बच्चे (एक मित्र )
मस्ती का आलम
घर की तरफ वापसी .............................




रविवार, 11 जुलाई 2010

नई चेतना

17 comments
मेरी पहली कोशिश कहानी लेखन में

धीरे धीरे पुल की ओर बढ़ते गौरी के कदम उसके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों को सामने ला रहे थे ।आकाश में बादल बस बरसने ही वाले थे और लगता मानो ये मेघ इस प्यासी धरती पर न्यौछावर होने को आतुर हैं पर..... गौरी वो तो बस चलती ही जा रही थी ।आज उसने पक्का निश्चय कर लिया था कि रोज की इस घुटन भरी जिन्दगी से मुक्ति पा लेगी खत्म कर देगी ये जिन्दगी से जद्दोजहद और बस सब शांत हो जायेगा हमेशा के लिये।
                                                                  कुछ रोज हुए उसकी इकलौती सहारा उसकी माँ भी उसे तन्हा छोड़ कर दूसरी दुनिया में चली गई थी ,अब गौरी के जीवन में सिवा तन्हाई के कुछ भी न था पहाड़ सी लम्बी जिन्दगी वो किसके सहारे जीती ।वो एक छोटी सी फैक्टरी में काम करती थी कालेज के बाद अच्छे अंक होने के बावजूद पैसे के अभाव से वो आगे नहीं पढ़ सकी ।माँ बेचारी अपने बूढ़े तन से आजीविका का भार कब तक ढोती ।कई जगह धक्के खाने के बाद ये नौकरी उसे मिली थी तो अब माँ उसका साथ छोड़ गई थी ।जब तक माँ थी तो जो हाथ उसे आशीष के लिये उठते थे आज उन्ही लोगों की नजरों में हवस नजर आने लगी थी । समय सब कुछ बदल देता है करीबी से करीबी रिश्ता भी खोखला नजर आने लगता है । नीरज उसका सच्चा साथी भी अब उससे मुंह मोड़ने लगा था उसकी ऊंचे रुतबे की चाहत ने उसे गौरी से दूर कर दिया था ।
                                                                      गौरी बहुत हौसले वाली थी परंतु जीवन में एक के बाद एक लगी ठोकर से वह टूट चुकी थी ।वो सब कुछ खत्म कर देना चाहती थी अपना अस्तित्व अपना वजूद ।अब तक वो पुल के पास पहुंच गई थी ।बारिश की नन्ही नन्ही बूंदे पड़नी शूरु हो गई थी खराब मौसम की वजह से सड़क पर आवाजाही भी कम थी ।ये पुल घर से नजदीक ही था अकसर वो अपने घर की खिड़की से पुल के नीचे से गुजरती इस शांत नदी को देखा करती थी मगर आज गौरी के मन की तरह ये भी अशांत थी।गौरी पुल के बीच में रूक कर कुछ क्षण नदी को देखती रही उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए बस दो गीले मोती उस उसकी आँखों से निकल कर कहीं जज़्ब हो गए । उसके कदम उपर उठे तभी उसे एक स्वर सुनाई दिया , दीदी ! कहां जा रही हो मुझे भी साथ ले चलो ना. ...... आज मुझसे मिलने भी नहीं आई ......नाराज हो क्या ? तुम यहां क्यों खड़ी हो........ मुझे पता है तुम्हें बारिश बहुत पसन्द है पर तुम तो हमेशा मुझे भी साथ लाती हो भीगने के लिये .........नन्हा मन न जाने कितने सवाल कर बैठा ।गौरी जो एक क्षण पहले अपनी जिन्दगी खत्म करने वाली थी आत्मग्लानी से भर गई कि वो अपनी परेशानी में नीशु को कैसे भूल गई .........नीशु एक अनाथ लड़की थी जो उसके पड़ोस में अपने चाचा के पास रहती थी जो अकसर नशे में चूर रहता था ।नीशु का ज्यादा समय गौरी के साथ बीतता था ।गौरी ने आगे बढ़कर नीशु को अपने सीने से लगाकर कहा........................................मैं अब तुम्हें कभी अकेला छोड़ कर नहीं जाऊँगी ..........मैं तुम्हारा सहारा बनूँगी.................तुम्हें दूसरी गौरी नहीं बनने दूंगी ।नई चेतना के साथ बारिश की रिमझिम में गौरी के कदम नीशु को साथ लिये घर की ओर बढ़ने लगते हैं ……………………..



                                                                                                              सु-मन

रविवार, 13 जून 2010

जिन्दगी- एक नदी

25 comments
जिन्दगी एक नदी की तरह है जो बस चलती जाती है कभी तेज तो कभी आहिस्ता1 नदी की तरह जिन्दगी भी कभी रुकती नही, रुक जाते हैं तो बस इंसान शायद हमारी फितरत ही ऐसी है कि हमारे जज्बात किनारे की रेत की तरह पानी के बहाव मे नही बह जाते अपितू नदी के सीने मे उभरी शिला की तरह जड़ होते हैं, स्थिर होते हैं1 फिर जिन्दगी की रफ्तार से उत्पन्न कम्पन धीरे धीरे उसमे चेतना जगाती है और चेतन मन उस शिला पर बैठ कर बहाव को रोक लेना चाहता है पर नादान नही जानता की कल जब जिन्दगी क बहाव बढ़ जायेगा तो उसका अस्तित्व ही मिट जायेगा जिन्दगी उसे रौन्द कर बस चलती जायेगी नहीं देखेगी कि रास्ते पर जज्बात बिखरे जाते हैं बस कुछ निशान से दे जायेगी अपने होने का और जब बहाव कम होने पर वह उभरेगा तो बहुत कुछ होगा और जो हमने पाया होगा कुछ मलिन सा रौंदा हुआ जिंदगी के उस बहाव से जो अभी दूर किसी और शिला पर जाकर थोड़ा रुक कर आगे बह गया........


                                                                                                 सु-मन

शुक्रवार, 14 मई 2010

आस्था की डोर – चैरा

24 comments
हिम का आंचल यानि हिमाचल के कुल्लू-मनाली, शिमला, डलहौजी आदि विख्यात पर्यटन स्थलों को तो आम तौर पर सैलानी जानते ही हैं लेकिन इस हिमाचल में कहीं कुछ ऐसे भी अनछुए स्थल हैं जहां सैलानी अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे ही एक स्थल पर मुझे पिछले साल जून में जाने का मौका मिला। इस स्थल का नाम है “चैरा” देव माहूँनाग का मूल स्थान ।इस स्थान की विशेषता यह है कि यहां स्थित माहूँनाग जी के मन्दिर का दरवाजा हर महिने की संक्रांति को ही खुलता है और यही नहीं उसे खोलने के लिये बकरे की बलि भी देनी पड़ती है यह जानकर मन में बहुत उत्सुकता हुई और हमने संक्रांति के समय वहां जाने का प्रोग्राम बनाया 1 यह स्थान हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के करसोग उपमंडल में है। तो चलिए चलते हैं चैरा की अविस्मणीय यात्रा पर। जो रहस्य, रोमांच, मस्ती, व साहस से परिपूर्ण है।
                                                  मंडी
 हमारी यात्रा शुरू होती है मंडी शहर से । व्यास नदी के किनारे स्थित ये मंडी शहर कुल्लू मनाली के रास्ते में ही है। मंडी से हमने अपनी यात्रा टाटा सूमों पर शुरू की। क्योंकि जिस स्थान पर हम जा रहे थे वहां छोटी कार ले जाना संभव नहीं था। यात्रा में जोखिम और कठिनाईयां भी होंगी , इसकी जानकारी हमने तभी हासिल कर ली थी जब हम चैरा घूमने का प्रोग्राम बना रहे थे। यह एक पारिवारिक यात्रा थी और हमारे साथ 4 छोटे बच्चे भी थे जिनकी आयु 5 से 13 तक की थी। सफर शुरू हुआ , धीरे धीरे गंतव्य की ओर कदम बढ़ने लगे । करीब 30 कि.मी. के सफर के बाद बहुत ही सुन्दर गांव आया “चैल चौक” यहाँ पर चील के हरे भरे जंगल दिखे तो शिथिल पड़ी आँखों को तरलता का भान हुआ । वहाँ पर चाय पीकर आगे की यात्रा आरम्भ की । धीरे धीरे गाड़ी उस पहाड़ी रास्ते पर चल रही थी और हमारी आँखें खिड़की से बाहर प्राकृतिक सुन्दरता की गलियों में विचरण कर रही थी । गर्मियों के दिन थे सूरज अपने पूरे सरूर पर था परंतु कहीं पर वृक्ष इतने घने थे कि सूरज की किरणें भी उनसे रास्ता मांगती प्रतीत होती थी । आगे एक के बाद एक ठहराव आते गये जिनमें चुराग,पांगणा,चिंडी आदि प्रमुख हैं । चिन्डी का रेस्ट हाऊस एक ऐसा आराम गृह है जो शरीर के साथ साथ रूह को भी सकून देता है क्योंकि यहां चारों ओर देखने पर नैसर्गिक सुन्दरता नज़र आती है । अब धीरे धीरे गंतव्य से दूरी घटने लगी थी और मंजिल को देखने की चाहत बढ़ने लगी थी क्योंकि अभी तक वो अनदेखा स्थान सिर्फ हमारी कल्पनाओं में था और जैसे कल्पना का पंछी झट से उड़ कर गगन को छू लेना चाहता है वैसे ही हमारा मन भी उस स्थान से जुड़े पहलुओं को जानने के लिये बेचैन था । अंत में हम करसोग पहुँच जाते हैं और वहां पर स्थित ममलेश्वर महादेव और कामाक्षा देवी के दर्शन करते हैं । सच मानो तो यात्रा तो अब शुरु होती है । वहां से 2-3 कि.मी. आगे जाने पर ‘करोल’ नाम का गांव आता है और यहां पर गाड़ी छोड़ कर सारा सामान अपने साथ लेकर हम अपनी पगयात्रा शुरू करते हैं चैरा की ओर । धीरे-धीरे कदम बढ़ने लगते है गंतव्य की ओर , रास्ते के नाम पर सिर्फ 3 फ़ुट की पगडंडी थी कहीं पर सीधी कहीं पर घुमावदार । करीब 2 पहाड़ इसी पगडंडी द्वारा तय करने के बाद एक घर नज़र आने लगता है प्यासे होठों को तरलता का आभास होने लगता है क्योंकि गर्मी के मौसम होने के कारण प्यास अधिक लग रही थी । अब तक हमारे पास साथ में लाया हुआ पानी खत्म हो चुका था । उस घर के लोगों ने हम अपरीचित जनों का खुले दिल से स्वागत किया और पीने को पानी दिया । कुछ देर आराम करके फिर से चलना शुरू किया तो कुछ दूरी तय करने के बाद इस यात्रा का अंतिम आश्रय एक छोटी सी दुकान आई जहाँ पर जरूरत की कुछ चीजें ही उपलब्ध थी । हमने भी अपने सामान को टटोल कर जरूरत की सभी चीजों का जायजा लिया क्योंकि इसके बाद सफर में हमें अपने पास रखी हुई चीजों पर ही निर्भर रहना था । वहां से एक नाले के साथ-2 नीचे चलते – चलते हम “अमला विमला” खड्ड में पहुंच गए । अभी मंजिल तक पहुंचने के लिये इसी खड्ड को हमें 14 बार लांघना था । यहां पर दूरभाष से भी सम्पर्क कट जाता है और रह जाते है सिर्फ हम , प्रकृति के मनभावन नजारे और हमारे विचार जो खुले आसमां के नीचे पहाड़ों की ऊंची ऊंची चोटियों पर किसी बादल की तरह उमड़ते घुमड़ते हुए एक अद्भुत अलौकिक आनंद की ओर ले जाते हैं ।
यहां प्रकृति हर कदम पर बिल्कुल नए रंग दिखा रही थी । कहीं पर पहाड़ बहुत हरे भरे थे तो कहीं पर बस पत्थर की बनावट सी प्रतीत होती थी1उन पहाड़ो में कुछ कन्दराएं थी जो उन लोगों के लिये रहने का ठिकाना थी जो अपने पशुओं,भेड़ बकरियों को चराने के लिये कई दिनों घर से बाहर रहते हैं । इसी जगह पर एक तूफानी चक्रवात ने हमें घेर लिया और हम पत्तों की तरह लहराते हुए गिर पड़े तब यही कन्दराएं हमारा सहारा बनी । कुछ दूरी तय करने पर केले का बागीचा नजर आया क्रमबद्ध अनेक केले के पेड़ । हम इस वक्त तक 3 बार खड्ड पार कर चुके थे और पानी की धारा के साथ-2 सफर करते करते ये पहाड़, ये पानी की हलचल, चट्टाने हमारे साथी बन गए थे अब खड्ड को पार करते हुए डर नही अपितु आनन्द की अनुभूति होने लगी थी ।
यात्रा का हर पहलू रोमांच से भरपूर हो तो अपना ही आनन्द है । ऐसे ही पानी की धारा के साथ साथ सफर चलता रहा बीच में एक नज़ारा अनुपम था । वहां के स्थानीय लोगों द्वारा सिंचाई के लिये पानी को एकत्रित किया गया था और बीच में 1-2 फुट की दूरी पर पत्थर रख कर चलने के लिये रास्ता बनाया गया था । छोटे बच्चों के साथ उस स्थान पर थोड़ी कठिनाई महसूस हुई परंतु जाने क्या था कि ये नन्हे बालक इतने कठिन रास्ते पर भी मस्ती के साथ चल रहे थे शायद ये वो दैवीय शक्ति थी जिसके आगोश में हम जा रहे थे । पानी ठहराव लिये हुए दर्पण की भांति नजर आ रहा था , अपने अन्दर काफी कुछ समेटे बाहर से शांत और अन्दर से उतना व्याकुल । दोनों तरफ के गगनचुम्बी पहाड़ के साये , उस ठहरे पानी में प्रतिबिम्ब बनाए , एक दम उन्नत खड़े थे आकाश की ओर और पानी उनकी विशालता को अपने अन्दर समेटे मौन था ।
 हम बस आगे बढ़ते जा रहे थे अभी प्रकृति काफी रहस्यों के उदघाटन करने वाली थी । आगे बढ़ने पर पहाड़ का अनोखा रूप मिला बस मिट्टी की रंगत सी दिखती थी नीचे पानी के बहाव से पहाड़ घिस गए थे और बीच में ऐसे प्रतीत होते थे मानों पत्थरों की चिनाई करके एक दीवार सी बनाई गई हो । एक पल में पहाड़ की टूटन का आभास होता था तो अगले पल पत्थरों के जुड़ाव का । पहाड़ ने ये रूप कैसे पाया ये सोच कर हैरानगी होती है । इंसान अपनी कृति पर कितना ही नाज़ करे परंतु प्रकृति का मुकाबला नहीं कर सकता ।
खड्ड आर पार करने का सिलसिला यूं ही चलता रहा और ऐसे ही रास्ता कटता रहा बहुत सारे स्मरणीय पलों के साथ और मंजिल के अंतिम पडाव के नज़दीक पहुँचने पर देखते हैं कि वहां फिर से केले का बगीचा है ऐसा प्रतीत हुआ मानो वहां भगवान विष्णु का साक्षात वास हो परंतु जब खेतों पर नजर डाली तो वो खाली थे शायद सुविधाओं के अभाव के कारण ऐसा था । अब अंत में जिस खड्ड को हम चट्टानों से पार करते आये थे उसे हमने एक छोटे से पुल से पार किया और पहुँच गए ‘देव माहूँनाग’ के मूल स्थान ‘चैरा’ । जिसके लिये 4 घण्टे की पगयात्रा करके आये थे ।मन्दिर का द्वार बन्द था जो अगले दिन सक्रान्ति को खुलना था । मन्दिर के साथ ही दो कमरे थे जिनका फर्श लकड़ी का था और दिवारें मिट्टी की । ये हमारा रात का आश्रय स्थल था । यह 4-5 घरों का ही गांव था जहां सुविधाओं की बहुत कमी थी फिर भी वहां के लोगों ने हमें कम्बल वगैरा दे दिये । मौसम का मिज़ाज कुछ बदला सा था अब हल्की हल्की बारिश होने लगी थी फिर भी इस जगह पर गर्मी बहुत अधिक थी । हमने साथ में लाया हुआ खाना खाया और सो गए क्योंकि सफर लम्बा था और थकान से भरा भी ।
सुबह उसी खड्ड में मुंह हाथ धोने के बाद देव दर्शन के लिये गए । मन्दिर के अन्दर गए तो देखा कि एक और चान्दी का छोटा सा द्वार है जिस पर साँप निर्मित थे। इस चान्दी के द्वार के आगे लकड़ी के खम्बों पर टिका थड़ा सा बना था जिस पर गोबर से लिपाई की गई थी। पुजारी ने बताया कि इस चान्दी के द्वार के भीतर एक गुफा है जिसमें एक गज जमीन में गाड़ी है 1 जब हमने गज के बारे में पूछा तो उन्होने बताया कि देव “माहूंनाग” और देव “धमूनीनाग” दो देवता इस खड्ड के दोनों ओर रहते थे जब और सभी देवता पहाड़ों के उपर रहने चले गए तो इन दोनों ने निर्णय लिया कि ये अपने मूल स्थान में ही निवास करेंगे । परंतु देव “धमूनीनाग” अपने निर्णय को भूल कर पहाड़ के उपर रहने चले गये तब देव “माहूंनाग” ने ये गज गाड़ कर अपने पहाड़ को उनसे भी ऊंचा कर दिया ।
ये “माहूंनाग” दानी राजा “कर्ण” हैं और कोई भी इनके द्वार से खाली नहीं जाता है ये सबकी खाली झोली भरते हैं । अनेक दम्पती संतान की चाह लिये इनके द्वार पर मन्नत मांगते हैं और चाह पूरी होने पर बकरे की बलि देते हैं । जो कोई भी सच्चे मन से शीश नवाता है उसे उस चांन्दी के दरवाजे से नाग के फुंकारने की आवाज सुनाई देती है । उस दिन एक दम्पति अपनी मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने आये थे । पूजा शुरू की गई फिर बकरे को लाया गया तो द्वार खुला । हमने भी उस गज के दर्शन किए तो हमारी कल्पना के दर्पण पर हकीकत की तस्वीर उभर आई । पूजा समाप्त होने के बाद पुजारी ने जिसे स्थानीय भाषा में “गूर” कहा जाता है देव की बातें लोगों तक पहुँचाई । उसके बाद पास में स्थित “हत्या माता” की पूजा की गई हमने अपने जीवन में पहली बार हत्या माता के बारे सुना । उन लोगों के अनुसार हत्या माता की पूजा से आप जीवन में की गई हत्या के दोष से मुक्त हो जाते हैं । फिर मन्दिर के बाहर स्थापित “मसाणू” जी की पूजा की गई जो इन पहाड़ी देवताओं के संगी साथी माने जाते हैं ।
अंत में वहां के लोगों से विदा लेकर हम अपने घर की ओर रवाना हो गए अनेक सवालों से घिरे मन के साथ कि क्या सच में कोई देव आपको संतान दे सकता है ? क्या किसी जीव की जिन्दगी इतनी सस्ती है कि आप अपने लिये उसकी बलि चढ़ा दें ? परंतु सच कहें तो देवालय में बैठ कर कोई प्रश्न नहीं उठता मन में । इंसान शून्य में विलीन हो जाता है , अंतस की गहराई में उतरने लगता है , मात्र कुछ समय के लिये ही सही अपनी सांसारिक दुनिया से दूर हो जाता है । शायद यही वो आस्था की शक्ति है जो आज के इस वैज्ञानिक युग मे भी हम इन संस्कृतियों से जुड़े हैं और बन्धे हैं भक्ति की डोर से ...............


इस स्थान जाने का उपयुक्त मौसम ---अप्रैल से जून

                                                                                                                                         सु-मन

रविवार, 9 मई 2010

ओशो -एक विचार

35 comments
अपने ब्लॉग की शुरूआत ‘ओशो’ के विचार से कर रही हूँ ।जीवन दर्शन में उनके दृष्टिकोण से काफी प्रभावित हूँ ।



आकाश को खिड़कियों से मत देखो ।
क्योंकि , खिड़कियां असीम आकाश को भी सीमाएं दे देती है ।

और , सत्य को शब्दों से नहीं ।
क्योंकि , शब्द निराकार को आकार दे देते हैं ।
आकाश को जानना हो, तो खुले आकाश के नीचे आ जाओ ।
अपनी-अपनी खिड़कियों को छलांगकर ।
और सत्य को जानना हो तो निशब्द में लीन हो जाओ ।
अपने-अपने शब्दों को त्यागकर ।
और सोचो मत करो और देखो।
क्योंकि, सोचने मात्र से खिड़कियों से छलांग नहीं लगती है ।
और न ही शब्दों का अतिक्रमण होता है ॥


.............“ओशो”.............
www.hamarivani.com
CG Blog www.blogvarta.com blogavli
CG Blog iBlogger