गुरुवार, 2 जुलाई 2015

चाह मेरी












चाह मेरी
हो जाऊँ इन बादलों सी 
स्याह मैं 
भर लूँ अपने भीतर 
खूब कालापन 
मुझमें समाहित हो 
तमाम रंग 
मेरे स्याह होने की गवाही दें 
लिखूँ मैं 
अपने भीतर की कालिख से 
एक प्रेमगीत !!

सु-मन 









13 comments:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

जरूर लिखें
सतरंगी रंगो के
साथ बहे प्रेम
और प्रेम गीत भी
अंदर स्याह से
निकल कर
मिलने बाहर की
स्याही से :)

Barthwal ने कहा…

वाह सुन्दरे

Dr. Monika S Sharma ने कहा…

Waah.... Khoob Badhiya

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, तीन सवाल - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-07-2015) को "जब बारिश आए तो..." (चर्चा अंक- 2025) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Yogi Saraswat ने कहा…


बहुत ही खूबसूरत शब्द सुमन जी !

मन के - मनके ने कहा…

एक पुराना गीत याद आ रहा है--मेरा गोरा रंग ले ले--मोह श्याम रम्ग दे-दे छुप जाऊंगी---?
शायद भूल रही हूं.
सुंदर.

Onkar ने कहा…

बहुत खूब

Digamber Naswa ने कहा…

प्रेम गीत कोरे कागज़ पे स्याही से ही तो लिखे जाता हैं ...
गहरी रचना ...

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत गहरे अर्थों को छोटे में ही समाहित कर दिया सार्थक कविता

प्रभात ने कहा…

तमाम रंग मेरे स्याह होने की गवाही दें.........प्रभावी पंक्तिया

Madhulika Patel ने कहा…

बहुत खूब |

anklet ने कहा…

very nice su-manji

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