शनिवार, 17 जून 2017

बस यूँ ही ~ 2


























मैं जिंदा तो हूँ , जिंदगी नहीं है मुझमें 
फक़त साँस चल रही है ज़िस्म फ़ना होने तक !!

सु-मन 

9 comments:

anklet ने कहा…

Nice

Jyoti khare ने कहा…

वाह
बहुत सुंदर

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर।

Poonam Matia ने कहा…

होता है कई बार ऐसे भी .......सही आंकलन किया ऐसी परिस्तिथियों का
..किन्तु मेरे विचार में
उम्मीद की किरणों को आने दो ज़ेहन के रौशनदानों से
फिर खिलेंगे फूल, महकेगी ज़िन्दगी खुशनुमा अरमानों से .. डॉ पूनम माटिया

'एकलव्य' ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति ,आभार। "एकलव्य"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-06-2017) को
"पिता जैसा कोई नहीं" (चर्चा अंक-2647)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Rewa Tibrewal ने कहा…

वाह

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मन के गहरे एहसास लिए पंक्तियाँ ...

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत खूब

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