रविवार, 10 अक्टूबर 2010

मन के विचार

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कहते हैं जीवन में एक ध्येय लेकर चलना चाहिये एक लक्ष्य लेकर, ताकि जीवन में कुछ मुकाम हासिल कर सको , कुछ हो आखिर में जो तुम्हारे जीवन की पूंजी होगी जीवन के अंतिम पड़ाव में तुम्हें लगे कि जीवन में जो सोचा वो कर लिया । पर क्या इंसान इस सोच के साथ ज्यादा समय टिक पाता है..क्या आखिर में वो तृष्णा रहित हो जाता है , क्या उसका चंचल मन ठहर जाता है..वो शून्य मे लीन हो पाता है , शायद नहीं इंसान की इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं होती। एक कड़ी है बस जो हर इच्छा को..हर अभीप्सा को..हर चाह को एक दूसरे से जोड़े है एक की पूर्ति दूसरे के होने का सबब बन जाती है बस और कुछ नही होता । भावों का ताना बाना बुनता मन जकड़ लेता है अपने जाल में और हम बस देखते रहते हैं उसके बुने मायाजाल को जो नशवर है..क्षणिक है..एक तीव्र हवा का झोंका उसे नष्ट कर देगा , उसका अस्तित्व मिटा देगा । तो क्या वो ध्येय..वो लक्ष्य.. भी उसके मन की ही उपज नहीं ,एक दबी सी चाह नहीं जो सारी उम्र इंसान का पीछा नही छोड़ती..हर क्षण उसे जकड़े रहती है अपने बाहुपाश में !!
                                                                                     
                                                                                      सु-मन

शनिवार, 11 सितंबर 2010

जीवन के पल

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हर गुजरा पल
              इक याद छोड़ जाता है ,
उस याद के भरोसे
              इक आस छोड़ जाता है ,
आस के बहकावे में
              इक सांस छोड़ जाता है ,
सांस की परछाई में
              इक घुटन छोड़ जाता है ,
घुटन में जकड़ कर
              इक जीवन छोड़ जाता है ,
जीवन को जीने के लिये
              इक इंसान छोड़ जाता है !!


                                                                         सु-मन

रविवार, 8 अगस्त 2010

टिप्पणी देना भी एक कला है ।

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टिप्पणी देना भी एक कला है ।जिस तरह अपने विचारों , अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोकर हम लिखते हैं वो हमारी अपनी अनुभूती होती है अपने विचारों के प्रति ..वो विचार जो धीरे धीरे मानसपटल पर विचरते हुए लेखनी से कोरे कागज में रंग भर देते हैं ।उसी तरह हमारे भावों का प्रतिरूप हमें टिप्पणियों के रूप में मिलता है जो हमारे लेखन को सार्थक बना देता है ,हमारे लेखन की रंगत को और बढ़ा देते हैं । सच में ये महसूस करने की बात है कि कुछ ब्लॉगर बहुत अच्छी टिप्पणी करते हैं अच्छी से मेरा मतलब प्रशंसा करने वाली टिप्पणियों से नहीं है बल्कि सकारात्मक दिशा में ले जाने वाली से है। कभी कभी पोस्ट पर टिप्पणियों का प्रभाव हावी लगता है।मुझे खुद महसूस हुआ है कि टिप्पणी से मिले सुझाव आपके लेखन को नया आयाम देते हैं क्योंकि कभी कभी ऐसा होता है कि हम अपना 100% नहीं दे पाते चूक हो जाती है । कभी समय का अभाव ,कभी शब्दों की अभाव और हम अपने लेखन का विश्लेषण नहीं कर पाते ,तब ब्लॉगर मित्रों द्वारा दिये गये सुझाव आत्मविश्लेषण करवाते हैं कहां क्या चूक हो गई इसका आभास होता है और सृजनशीलता को नया आयाम मिलता है।मैने शुक्रगुजार हूँ आप सभी की जिन्होनें मेरे लेखन को सराहा और उचित सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन किया !!





सु-मन 

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

कितना अवसरवादी हो गया है इंसान

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 आज इंसान कितना अवसरवादी हो गया है ।हर कोई बस दूसरे को नीचा दिखाने की फिराक में है । आज के इस अन्धे युग में इंसान अपनी इंसानियत तक भूल गया है हर कोई बस अन्धी दौड़ में भागे जा रहा है बिना ये जाने कि वो राह उसकी मंजिल तक जाती भी है या नहीं । उसे ये सोचने की फुर्सत ही कहाँ है वो तो बस ये देखता है कि दूसरा आगे जा रहा है और मैं उसे पीछे कैसे धकेल सकता हूँ ।बस यही सोच रह गई है इंसान की।अपनी इस सोच से वो अपनी मंजिल की राह भी भटक जाता है क्योंकि अपनी मंजिल की राह में तो उसने कदम बढ़ाया ही नहीं होता वो तो बस दूसरों की राहों मे नजरें लगाए रहता है कि कब दूसरा आदमी कदम बढ़ाए और मैं उसकी राह में रोड़े डाल दूँ।मन बहुत खिन्न होता है जब भी ऐसे लोगों को देखती हूँ ।हमारे सभ्य समाज की सोच कितनी बदल गई है शिक्षा तो इंसान के जीवन में नई क्रांति लाती है उसके सोच के दायरे को बढ़ाती है ना कि उसे इतना संकीर्ण बना देती है कि उसे बोध ही नही होता कि कांटे बो कर कभी भी फूल नहीं खिला करते।



मुझे याद है हिन्दी की कहावतें

*लालच बुरी बला है ।
*ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनका भला करते हैं जो अपना भला आप करते है।

परंतु अवसरवादी इंसान के लिये कहावतें कुछ इस तरह होनी चाहिये

*अवसरवादी होना भी एक कला है ।
*बैमानी सबसे बड़ी नीति है ।
*भगवान भी उनकी सहायता करते हैं जो दूसरों का बुरा हाल करते हैं ।
                                                                                         
                                                                                            सु-मन








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