शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

आस भरी तसल्लियाँ

















बाँध लेते हैं हम
कलाई में अपनी
कुछ हिफाज़तें
जीने की खातिर

मिल ही जाती है
कुछ इस तरह
हमारी चाहों को
आस भरी तसल्लियाँ !!


सु-मन 

7 comments:

दिगंबर नासवा ने कहा…

तसल्लियें मिल जाएँ तो जीना आसान हो जाता है ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-07-2016) को "आया है चौमास" (चर्चा अंक-2398) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " मज़हबी या सियासी आतंकवाद " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Onkar ने कहा…

बहुत खूब

Saru Singhal ने कहा…

This is such a beautiful thought. Loved it to bits.

Unknown ने कहा…

आसभरी तसल्लियाँ ! क्या ही सही विचार !
बधाई। सस्नेह

Unknown ने कहा…

आसभरी तसल्लियाँ ! क्या ही सही विचार !
बधाई। सस्नेह

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