रविवार, 14 नवंबर 2010

‘कनुप्रिया’ .........धरमवीर भारती (2)

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तीसरा गीत


घाट से लौटते हुए
तीसरे पहर की अलसायी बेला में
मैं ने अक्सर तुम्हें कदम्ब के नीचे
चुपचाप ध्यानमग्न खड़े पाया
मैं न कोई अज्ञात वनदेवता समझ
कितनी बार तुम्हें प्रणाम कर सिर झुकाया
पर तुम खड़े रहे अडिग, निर्लिप्त, वीतराग, निश्चल!
तुम ने कभी उसे स्वीकारा ही नहीं !


दिन पर दिन बीतते गये
और मैं ने तुम्हें प्रणाम करना भी छोड़ दिया
पर मुझे क्या मालूम था कि वह अस्वीकृति ही
अटूट बन्धन बन कर
मेरी प्रणाम-बद्ध अंजलियों में, कलाइयों में इस तरह
लिपट जायेगी कि कभी खुल ही नहीं पायेगी।


और मुझे क्या मालूम था कि
तुम केवल निश्चल खड़े नहीं रहे
तुम्हें वह प्रणाम की मुद्रा और हाथों की गति
इस तरह भा गयी कि
तुम मेरे एक-एक अंग की एक-एक गति को
पूरी तरह बाँध लोगे


इस सम्पूर्ण के लोभी तुम
भला उस प्रणाम मात्र को क्यों स्वीकारते ?
और मुझ पगली को देखो कि मैं
तुम्हें समझती थी कि तुम कितने वीतराग हो
कितने निर्लिप्त !


चौथा गीत


यह जो दोपहर के सन्नाटे में
यमुना के इस निर्जन घाट पर अपने सारे वस्त्र
किनारे रख
मैं घण्टों जल में निहारती हूँ


क्या तुम समझते हो कि मैं
इस भाँति अपने को देखती हूँ ?


नहीं, मेरे साँवरे !
यमुना के नीले जल में
मेरा यह वेतसलता-सा काँपता तन-बिम्ब, और उस के चारों
ओर साँवली गहराई का अथाह प्रसार जानते हो
कैसा लगता है-


मानो यह यमुना की साँवली गहराई नहीं है
यह तुम हो जो सारे आवरण दूर कर
मुझे चारों ओर से कण-कण, रोम-रोम
अपने श्यामल प्रगाढ़ अथाह आलिंगन में पोर-पोर
कसे हुए हो !


यह क्या तुम समझते हो
घण्टों-जल में-मैं अपने को निहारती हूँ
नहीं, मेरे साँवरे !


क्रमश :

सोमवार, 8 नवंबर 2010

‘कनुप्रिया’ .........धरमवीर भारती (1)

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‘कनुप्रिया’ .........धरमवीर भारती जी की अमिट कृति जो हमेशा के लिये उन्हें अमर कर गई। कृष्ण के प्रति राधा के आलौकिक प्रेम के हर पहलू को,राधा के मन में पनपते उन्मुक्त भावों को भारती जी बखूबी उकेरा है। बहुत समय से ये अभिलाषा थी कि उनकी इस कृति के कुछ अंश आप सबकी नज़र करूं ।आशा करती हूँ कि आपको मेरा ये प्रयास पसन्द आयेगा.........

पहला गीत

ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे
तुम को क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए-धूल में मिली हूँ
धरती में गहरे उतर जड़ों के सहारे
तु्म्हारे कठोर तने के रेशों में कलियाँ बन, कोंपल बन,सौरभ बन,लाली बन-
चुपके से सो गयी हूँ
कि कब मधुमास आये और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन से छा जाओ !

फिर भी तुम्हें याद नहीं आया, नहीं आया,
तब तुम को मेरे इन जावक-रचित पाँवों ने
केवल यह स्मरण करा दिया कि मैं तुम्हीं में हूँ
तुम्हारे ही रेशे-रेशे में सोयी हुई-
और अब समय आ गया कि
मैं तुम्हारी नस-नस में पंख पसार कर उडूँगी
और तुम्हारी डाल-डाल में गुच्छे-गुच्छे लाल-लाल
कलियाँ बन खिलूँगी !
ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक-वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरी ही प्रतीक्षा में
कितने ही जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे !


दूसरा गीत

यह जो अकस्मात्
आज मेरे जिस्म के सितार के
एक-एक तार में तुम झंकार उठे हो-
सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
तुम कब से मुझ में छिपे सो रहे थे।

सुनो, मैं अक्सर अपने सारे शरीर को-
पोर-पोर को अवगुण्ठन में ढँक कर तुम्हारे सामने गयी
मुझे तुम से कितनी लाज आती थी,
मैं ने अक्सर अपनी हथेलियों में
अपना लाज से आरक्त मुँह छिपा लिया है
मुझे तुम से कितनी लाज आती थी
मैं अक्सर तुम से केवल तम के प्रगाढ़ परदे में मिली
जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता था
मुझे तुम से कितनी लाज आती थी,

पर हाय मुझे क्या मालूम था
कि इस वेला जब अपने को
अपने से छिपाने के लिए मेरे पास
कोई आवरण नहीं रहा
तुम मेरे जिस्म के एक-एक तार से
झकार उठोगे
सुनो ! सच बतलाना मेरे स्वर्णिम संगीत
इस क्षण की प्रतीक्षा में तुम
कब से मुझ में छिपे सो रहे थे।

क्रमश:

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

मन के विचार

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कहते हैं जीवन में एक ध्येय लेकर चलना चाहिये एक लक्ष्य लेकर, ताकि जीवन में कुछ मुकाम हासिल कर सको , कुछ हो आखिर में जो तुम्हारे जीवन की पूंजी होगी जीवन के अंतिम पड़ाव में तुम्हें लगे कि जीवन में जो सोचा वो कर लिया । पर क्या इंसान इस सोच के साथ ज्यादा समय टिक पाता है..क्या आखिर में वो तृष्णा रहित हो जाता है , क्या उसका चंचल मन ठहर जाता है..वो शून्य मे लीन हो पाता है , शायद नहीं इंसान की इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं होती। एक कड़ी है बस जो हर इच्छा को..हर अभीप्सा को..हर चाह को एक दूसरे से जोड़े है एक की पूर्ति दूसरे के होने का सबब बन जाती है बस और कुछ नही होता । भावों का ताना बाना बुनता मन जकड़ लेता है अपने जाल में और हम बस देखते रहते हैं उसके बुने मायाजाल को जो नशवर है..क्षणिक है..एक तीव्र हवा का झोंका उसे नष्ट कर देगा , उसका अस्तित्व मिटा देगा । तो क्या वो ध्येय..वो लक्ष्य.. भी उसके मन की ही उपज नहीं ,एक दबी सी चाह नहीं जो सारी उम्र इंसान का पीछा नही छोड़ती..हर क्षण उसे जकड़े रहती है अपने बाहुपाश में !!
                                                                                     
                                                                                      सु-मन

शनिवार, 11 सितंबर 2010

जीवन के पल

22 comments
हर गुजरा पल
              इक याद छोड़ जाता है ,
उस याद के भरोसे
              इक आस छोड़ जाता है ,
आस के बहकावे में
              इक सांस छोड़ जाता है ,
सांस की परछाई में
              इक घुटन छोड़ जाता है ,
घुटन में जकड़ कर
              इक जीवन छोड़ जाता है ,
जीवन को जीने के लिये
              इक इंसान छोड़ जाता है !!


                                                                         सु-मन

रविवार, 8 अगस्त 2010

टिप्पणी देना भी एक कला है ।

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टिप्पणी देना भी एक कला है ।जिस तरह अपने विचारों , अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोकर हम लिखते हैं वो हमारी अपनी अनुभूती होती है अपने विचारों के प्रति ..वो विचार जो धीरे धीरे मानसपटल पर विचरते हुए लेखनी से कोरे कागज में रंग भर देते हैं ।उसी तरह हमारे भावों का प्रतिरूप हमें टिप्पणियों के रूप में मिलता है जो हमारे लेखन को सार्थक बना देता है ,हमारे लेखन की रंगत को और बढ़ा देते हैं । सच में ये महसूस करने की बात है कि कुछ ब्लॉगर बहुत अच्छी टिप्पणी करते हैं अच्छी से मेरा मतलब प्रशंसा करने वाली टिप्पणियों से नहीं है बल्कि सकारात्मक दिशा में ले जाने वाली से है। कभी कभी पोस्ट पर टिप्पणियों का प्रभाव हावी लगता है।मुझे खुद महसूस हुआ है कि टिप्पणी से मिले सुझाव आपके लेखन को नया आयाम देते हैं क्योंकि कभी कभी ऐसा होता है कि हम अपना 100% नहीं दे पाते चूक हो जाती है । कभी समय का अभाव ,कभी शब्दों की अभाव और हम अपने लेखन का विश्लेषण नहीं कर पाते ,तब ब्लॉगर मित्रों द्वारा दिये गये सुझाव आत्मविश्लेषण करवाते हैं कहां क्या चूक हो गई इसका आभास होता है और सृजनशीलता को नया आयाम मिलता है।मैने शुक्रगुजार हूँ आप सभी की जिन्होनें मेरे लेखन को सराहा और उचित सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन किया !!





सु-मन 
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