शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

प्रीत

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बीज से पनपता है पौधा
पौधे में फिर पनपे बीज
प्रीत से महकता है जीवन
जीवन में फिर महके प्रीत !!

सु-मन 

बुधवार, 29 अगस्त 2012

ख़ामोशी

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आज मैं हूँ तो मेरी ख़ामोशी के अफ़साने हैं
कल इन लफ़्ज़ों में ढूँढोगे मेरी ख़ामोशी को ..!!




सु-मन 

रविवार, 26 अगस्त 2012

मौन

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एक चुप्पी सी है बस


और कुछ नही 


शब्दों के परे का 'मौन'


कितना गहरा होता है ना ...!!









सु-मन 

सोमवार, 28 नवंबर 2011

आखिरी इबारत

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जिंदगी की किताब खोली
देखा !
कितने पन्नें पलट गए
कुछ भरे
कुछ खाली....

कुछ में बैठे हैं शब्द
मेहमां बनकर
और
कुछ में हैं जज्बात
बेजुबान से....

रह गए हैं अब तो
चंद ही पन्ने बाकी 

हूँ इतंजार में
कब लिखेगी मौत
मेरी जिंदगी की
      आखिरी इबारत...........  


सु-मन





रविवार, 6 नवंबर 2011

बेरंग जिंदगी

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क्यूँ जिंदगी हमसे आँख मिचोली करती है

      सुबह खुशी में खिलकर क्यूँ शाम गम में ढलती है

कहते हैं जिंदगी हर पल रंग बदलती है
      
      फिर क्यूँ हमें तस्वीर इसकी बेरंग सी झलकती है !!
                                                                    

                                       सु-मन  


रविवार, 3 अप्रैल 2011

जिन्दगी

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                                       हर रक में एक सिसकी

                                              हर लफ़्ज में एक आह

                                       क्या वो तू ही थी जिन्दगी

                                              जिससे मांगी थी मैनें पनाह !!

                                                          

                                                                                       सु-मन

मंगलवार, 22 मार्च 2011

दूसरा कौन

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एक बार राधा से श्रीकृष्ण से पूछा - हे कृष्ण ! तुम प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु तुमने विवाह मुझसे नहीं किया , ऐसा क्यों ? मैं अच्छे से जानती हूं तुम साक्षात भगवान ही हो और तुम कुछ भी कर सकते हों , भाग्य का लिखा बदलने में तुम सक्षम हों , फिर भी तुमने रुकमणी से शादी की , मुझसे नहीं।
राधा की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया - हे राधे ! विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। तुम मुझे यह बताओं राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है। हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है। नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक महान और पवित्र होता है। इसीलिए राधाकृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं और सदैव पूजनीय हैं।



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