मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

टूटती नेमतें

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टूट कर बिखर जाती हैं अक्सर नेमतें 
वक़्त की शाख से लम्हें झड़ने के बाद !!



सु-मन 








सोमवार, 24 नवंबर 2014

हसरतों की बारिश

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यूँ ही बरसती रहें हसरतों की बारिशें
यूँ ही किसी रोज़ फना हो जाऊं मैं
यूँ ही छलकते रहो मेरी आँखों से तुम
यूँ ही शब-ओ-रोज़ भीगती जाऊं मैं !!



सु-मन 

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

ख़लिश

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बहुत जानलेवा है ख़लिश तेरी 
साँस आती नहीं..जान जाती नहीं !!


सु-मन 

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

ख़ामोशियाँ

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बे-हद होती हैं ये ख़ामोशियाँ 
टूटती नहीं, हर हद तोड़ जाती हैं !!


सु-मन 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कत्ल-ए-नज़्म

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...लिखती हूँ
मिटा देती हूँ
खुद अपने लफ्ज़ों को... 

...करती हूँ
कत्ल-ए-नज़्म
यूँ खुद को सजा देती हूँ !!


सु-मन

शनिवार, 6 सितंबर 2014

शब्द से ख़ामोशी तक ..अनकहा ‘मन’ का

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एक नज़्म
अटकी है
अभी साँसों में
कुछ लफ्ज़
बह रहे
लहू में क़तरा क़तरा ...

एक दर्द   
ठहरा है
अभी ज़िस्म में
कुछ बरक
घुल रहे
रूह में रफ़्ता रफ़्ता ....!!
*****
(साँसों से चल कर ...रूह में ज़ज्ब हुआ कुछ ..क्या कुछ ...नहीं जाना | जाना तो बस इतना कि लफ्ज़ झरते रहे ...रूह भीगती रही ...दर्द घटता रहा ..नज़्म बढ़ती रही )

सु-मन 


शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

भीगा सावन

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(ऑफिस जाते हुए सावन का नज़ारा )

भीगा भीगा सा है मौसम 
भीगी भीगी सी रुत बहार है 
भीगा भीगा सा है 'मन' मेरा 
भीगी भीगी सी सावन की फुहार है !!


सु-मन 

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